विशाखापट्टनम और कांडला पोर्ट के जरिए सीधे निर्यात की यह योजना जिले को ग्लोबल हब बना सकती थी, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण यह योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में नजर आ रही है।
बुंदेलखंड का गौरव कहा जाने वाला छतरपुर का ग्रेनाइट उद्योग आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के बदलते समीकरण और स्थानीय स्तर पर संसाधनों के अभाव ने इस फलते-फूलते कारोबार की कमर तोड़ दी है। कभी जिले की आर्थिक मजबूती का आधार रहे इस उद्योग की हालत यह है कि यहां की 47 चिह्नित खदानों में से अब केवल 4 ही किसी तरह संचालित हो पा रही हैं, जबकि शेष खदानें या तो बंद हो चुकी हैं या वहां उत्पादन पूरी तरह ठप पड़ा है। जानकारों के मुताबिक, कभी करोड़ों का टर्नओवर देने वाला यह कारोबार अब सिमटकर महज एक चौथाई ही बचा है।
छतरपुर का ग्रेनाइट उद्योग लंबे समय से चीन के साथ होने वाले व्यापार पर निर्भर रहा है। जिले से निकलने वाले रॉ ग्रेनाइट स्टोन (कच्चा पत्थर) का एक बड़ा हिस्सा चीन निर्यात किया जाता था। हालांकि, कोरोना काल के बाद से व्यापारिक प्रतिबंधों और पोट्र्स पर पुराना स्टॉक अटकने के कारण सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित हुई है। वर्तमान स्थिति यह है कि चीन को होने वाली सप्लाई में 60 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है। पोट्र्स पर पड़े पुराने स्टॉक के क्लियर न होने से कारोबारियों ने नई खदानों में निवेश और उत्पादन से हाथ खींच लिए हैं।
जिले के ग्रेनाइट उद्योग के संकट में होने का एक बड़ा कारण स्थानीय स्तर पर फिनिशिंग यूनिट्स (कटिंग और पॉलिशिंग इकाइयां) का न होना है। छतरपुर से निकलने वाले पत्थर को तैयार करने के लिए आज भी राजस्थान के किशनगढ़ भेजा जाता है। वहां से फिनिश होने के बाद यही पत्थर वापस मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के बाजारों में बिकने आता है। इस पूरी प्रक्रिया में ट्रांसपोर्टेशन की लागत इतनी बढ़ जाती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिस्पर्धा में जिले का ग्रेनाइट पिछड़ रहा है। यदि जिले में ही स्टोन पार्क और फिनिशिंग यूनिट्स हों, तो लागत में भारी कमी आ सकती है।
उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले खजुराहो में स्टोन पार्क स्थापित करने की योजना बनाई गई थी, ताकि यहां से सीधे अमेरिका, ब्रिटेन और सऊदी अरब जैसे देशों को फिनिश माल निर्यात किया जा सके। विशाखापट्टनम और कांडला पोर्ट के जरिए सीधे निर्यात की यह योजना जिले को ग्लोबल हब बना सकती थी, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण यह योजना फिलहाल ठंडे बस्ते में नजर आ रही है।
कोरोना के बावजूद साल 2020-21 में जिले से 94000 घनमीटर ग्रेनाइट निर्यात हुआ था। इसमें शासन को 1000 रुपए प्रति घनमीटर के हिसाब से 9.40 करोड़ की रॉयल्टी मिली। इसी तरह वर्ष 2021-22 में करीब 1.11 लाख घनमीटर ग्रेनाइट का निर्यात किया गया। इसमें 11 करोड़ से अधिक राशि बतौर रॉयल्टी शासन को मिली है। वर्ष 2023-24 में 11 करोड़ का ग्रेनाइट ही निर्यात हो सका। पिछले दो साल से ग्रेनाइट से रॉयल्टी स्थिर है। क्योंकि सप्लाई रूकी हुई है।
हालांकि, बीते वर्ष सागर और भोपाल में आयोजित माइनिंग एवं इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव में छतरपुर के ग्रेनाइट को प्रमोट किया गया है। शासन स्तर पर करीब 371 करोड़ रुपए के एमओयू किए जाने की बात कही जा रही है। खनिज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सरकार अब रॉ ब्लॉक के बजाय फिनिश प्रोडक्ट तैयार करने पर जोर दे रही है। लेकिन हकीकत यह है कि ये एमओयू अब तक धरातल पर नहीं उतर सके हैं। यदि नए निवेशक वास्तव में यहाँ इकाइयां लगाते हैं, तभी बंद पड़ी खदानों में फिर से हलचल शुरू हो पाएगी।
ग्रेनाइट उद्योग के विस्तार की योजना पर शासन स्तर पर कार्य किया जा रहा है। रीजनल कॉन्क्लेव में भी इसके प्रेजेंटेशन और प्रस्ताव आए हैं। फिलहाल परिस्थितियां सकारात्मक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं और निवेश के जरिए इस सेक्टर में तेजी लाने की योजना है।
अमित मिश्रा, सहायक संचालक, खनिज विभाग