
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में शिक्षा के मंदिर की नींव ही भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनदेखी के साए में खड़ी नजर आ रही है। विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देने के नाम पर महज तीन साल पहले 4.86 करोड़ और 3.56 करोड़ की राशि से दो भवनों आलेख और कर्मशिला के निर्माण में पानी की तरह बहा दी गई, लेकिन धरातल पर जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, वह चौंकाने के साथ-साथ डराने वाली भी है। महज तीन साल के भीतर ही नए नवेले निर्माण में दरार और सीमेंट झडऩे से गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। भवन के निर्माण के दौरान भी भवन में दरार आने पर सवाल उठे थे, तब विश्वविद्यालय ने सुधार कराने की बात कही, लेकिन बिना सुधार भवन हैंडओवर ले लिया और अब यही दरारें बढऩे से संकट बढ़ गया है। इसके अलावा खुले तार व विद्युत कनेक्शन बॉक्स खुला होने से बारिश में करंट का संकट भी खड़ा हो गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किन शर्तों और किस दबाव में अधूरे निर्माण कार्य के बावजूद ठेकेदार को क्लीयरेंस सर्टिफिकेट जारी कर हैंडओवर ले लिया गया? बिना गुणवत्ता जांच के दी गई इस हरी झंडी की कीमत अब परिसर में नियमित आने वाले छात्र-छात्राएं अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाकर चुका रहे हैं। निर्माण में इस्तेमाल हुई सामग्री के स्तर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 3.56 करोड़ रुपए की लागत से बने आलेख भवन की दीवारों से अभी से ही बालू और सीमेंट झडऩे लगा है।
वैसे तो पूरे विश्वविद्यालय में कुल 18 हजार विद्यार्थी नामांकित हैं, लेकिन इन जर्जर इमारतों की कुल बैठक क्षमता को देखें तो प्रतिदिन 3 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं की जान सीधे तौर पर खतरे के साए में है।
कर्मशिला भवन में 2,000 से अधिक छात्रों पर संकट: लगभग 4.86 करोड़ रुपए की लागत से बने कर्मशिला भवन में 100-100 विद्यार्थियों की क्षमता वाले 21 से 24 बड़े कक्ष बनाए गए हैं, जहां रोजाना 2 हजार से अधिक छात्र कक्षाएं लेते हैं। यहां सीढिय़ों के ठीक नीचे मुख्य बिजली का कनेक्शन बॉक्स पूरी तरह खुला पड़ा है और सीलन के कारण दीवारों में करंट फैलने का खतरा बना रहता है।
आलेख भवन के 1,800 क्षमता वाले हॉल्स जर्जर: 3.56 करोड़ की लागत से बने आलेख भवन में 300-300 क्षमता वाले 6 बड़े हॉल हैं। इस भवन की दीवारों से सीमेंट-बालू उखड़ रहा है, जिससे यहां बैठने वाले सैकड़ों छात्रों में खौफ है।
परीक्षा हॉल में टली बड़ी अनहोनी: एनएल-2 भवन, जहां एलएलबी की परीक्षाएं संचालित हो रही थीं, वहां अचानक छत का प्लास्टर टूटकर सीधे विद्यार्थियों के ऊपर आ गिरा। गनीमत रही कि कोई गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ। इस प्रशासनिक चूक पर पर्दा डालने के लिए आनन-फानन में भवन में ताला जड़ दिया गया।
ज्ञान के मंदिर (लाइब्रेरी) में झांकता सरिया: सेंट्रल लाइब्रेरी में वाटर कूलर के पास छत की सीमेंट उखड़ चुकी है और लोहे का जंग लगा सरिया साफ दिखाई दे रहा है।
हैरानी की बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन हर साल भवनों के रख-रखाव, जीर्णोद्धार और मरम्मत के नाम पर लाखों रुपए का बजट कागजों पर खर्च दिखाता है। बावजूद इसके प्रशासनिक भवन और जूलॉजी लैब जैसे पुराने परिसरों की हालत भी बदतर होती जा रही है।
मामले पर घिरते देख विवि प्रबंधन अब लीपापोती वाले बयानों का सहारा ले रहा है। कुलसचिव यशवंत सिंह पटेल का कहना है कि खुले बिजली के तारों को जल्द सुरक्षित कराया जाएगा और अत्यधिक जर्जर भवनों से कक्षाओं को दूसरे स्थानों पर शिफ्ट किया जाएगा। हालांकि, सवाल अब भी कायम है कि करोड़ों का चूना लगाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार पर सख्त कार्रवाई कब होगी?