छतरपुर

कहीं चूल्हा-चौका तो कहीं खेतों में मजदूरी, बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में 10 साल की उम्र के बाद पढ़ाई छोड़ रही हैं बेटियां, बेटों पर कम उम्र में कमाने की जिम्मेदारी

भारत सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2025 के राज्य स्तरीय आंकड़ों के विश्लेषण से एक दर्दनाक हकीकत सामने आई है।

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Apr 10, 2026
एआइ

बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा के सुनहरे सपनों पर गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों का ग्रहण लग रहा है। भारत सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2025 के राज्य स्तरीय आंकड़ों के विश्लेषण से एक दर्दनाक हकीकत सामने आई है। स्कूली बच्चों का ड्रॉपआउट रेट (पढ़ाई छोडऩे की दर) 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, हर 10 में से 2 बच्चे स्कूल जाने के बजाय काम में हाथ बंटाने को मजबूर हैं।

बेटियों के हिस्से चूल्हा-चौका, बेटों पर कमाई का बोझ

सर्वेक्षण के सामाजिक मानकों के विश्लेषण से पता चला है कि पढ़ाई छोडऩे के कारण लिंग के आधार पर अलग-अलग हैं।

बेटियां- ग्रामीण क्षेत्रों में 10 साल की उम्र पार करते ही बेटियों का ड्रॉपआउट तेजी से बढ़ता है। उन्हें स्कूल से निकालकर घर की साफ-सफाई, खाना बनाने, पानी भरने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।

बेटे- लडक़ों पर बहुत कम उम्र में ही परिवार की आय बढ़ाने का दबाव आ जाता है। उन्हें पढ़ाई छोडकऱ खेतों में मजदूरी करने, निर्माण कार्यों में ईंटें ढोने या शहर जाकर छोटे होटलों और गैरेज में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

उच्च माध्यमिक स्तर पर सबसे बड़ा संकट

रिपोर्ट के रुझान बताते हैं कि प्राथमिक स्तर तक तो बच्चे जैसे-तैसे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन उच्च कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते बेंच खाली होने लगती हैं।

कक्षा 9 से 12- इस स्तर पर ड्रॉपआउट दर जिले में सबसे ज्यादा 22 से 25 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है।

आर्थिक संलग्नता- स्कूल छोडऩे वाले इन बच्चों में से लगभग 18 प्रतिशत सीधे तौर पर किसी न किसी प्रकार की मजदूरी या घरेलू आर्थिक गतिविधि में रमे हुए हैं।
पलायन- शिक्षा के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा
बिजावर और बड़ामलहरा जैसे विकासखंडों में ड्रॉपआउट की मुख्य वजह मौसमी पलायन है। रिपोर्ट के अनुसार, जब गरीब परिवार काम की तलाश में दिल्ली, पंजाब या हरियाणा जाते हैं, तो उनके साथ जाने वाले 70 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई उसी सत्र में पूरी तरह टूट जाती है। वापस लौटने के बाद इनमें से बहुत कम बच्चे दोबारा स्कूल की शक्ल देख पाते हैं।


प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती


शिक्षाविदों का कहना है कि पीएलएफएस की यह रिपोर्ट प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। केवल मुफ्त ड्रेस या मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) के भरोसे इन 20त्न बच्चों को वापस स्कूल लाना संभव नहीं है। इसके लिए ग्रामीण परिवारों के आर्थिक सशक्तिकरण और पलायन रोकने के ठोस उपायों की सख्त जरूरत है। फिलहाल, जिला प्रशासन इन विशिष्ट आंकड़ों के आधार पर प्रभावित क्षेत्रों में विशेष 'घर-घर संपर्क' अभियान शुरू करने की तैयारी कर रहा है।

Published on:
10 Apr 2026 12:45 pm
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