पिछले वर्ष की तरह इस बार भी अभियान की शुरुआत तालाबों के किनारे खड़े होकर मुस्कुराते हुए फोटो सेशन से हुई है, जबकि शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले संकटमोचन तालाब और सिंघाड़ी नदी आज भी अपनी बदहाली और सरकारी उपेक्षा की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
जिले में जल स्रोतों के पुनरुद्धार और संरक्षण के दावे एक बार फिर हवा में तैरने लगे हैं। जल गंगा संवर्धन अभियान के नए चरण का आगाज बड़े तामझाम के साथ किया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत प्रशासन के इन दावों को आइना दिखा रही है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी अभियान की शुरुआत तालाबों के किनारे खड़े होकर मुस्कुराते हुए फोटो सेशन से हुई है, जबकि शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले संकटमोचन तालाब और सिंघाड़ी नदी आज भी अपनी बदहाली और सरकारी उपेक्षा की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
पिछले वर्ष भी इसी शोर-शराबे के साथ अभियान शुरू हुआ था, लेकिन आज भी छतरपुर के प्रमुख जलाशयों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अभियान जल संरक्षण के बजाय केवल कागजी औपचारिकता और फोटो खिंचवाने का माध्यम बनकर रह गया है। नतीजतन, शहर की ऐतिहासिक धरोहरें और जल स्रोत धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंच रहे हैं।
इस वर्ष अभियान का श्रीगणेश गायत्री मंदिर तलैया से किया गया, जहां स्थानीय विधायक ललिता यादव, प्रभारी कलेक्टर और नगर पालिका अध्यक्ष सहित तमाम आला अधिकारियों ने श्रमदान का दिखावा किया। विडंबना यह है कि इस तलैया के जीर्णोद्धार का कार्य पिछले बजट सत्र में ही शामिल किया गया था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी यहंा काम अधूरा पड़ा है। यहां भी गाद निकासी और सौंदर्यीकरण के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
शहर के हृदय स्थल पर स्थित संकटमोचन तालाब की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय है। मार्च 2025 में प्रशासन ने बड़े दावों के साथ यहां सफाई अभियान छेड़ा था, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।
जलकुंभी और गंदगी- तालाब का आधा हिस्सा आज भी जहरीली जलकुंभी और कचरे के ढेर से ढका हुआ है।
क्षतिग्रस्त सुरक्षा घेरा- मुख्य मार्ग की तरफ तालाब की रेलिंग लंबे समय से टूटी हुई है, जो हादसों को न्योता दे रही है, लेकिन प्रशासन ने इसकी मरम्मत की सुध तक नहीं ली।
सिर्फ दिखावा- स्थानीय लोगों का कहना है कि अभियान के दौरान सिर्फ सफाई का ढोंग किया जाता है, उसके बाद कोई पलटकर नहीं देखता।
सिंघाड़ी नदी के पुनर्जीवन का सपना भी अब तक अधूरा है। 28 अप्रेल 2025 को इसके जीर्णोद्धार का प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, लेकिन 11 महीने बाद भी हालात चिंताजनक हैं।
बजट का बंदरबांट- नगर पालिका ने शुरुआती चरण में जेसीबी चलाकर सफाई के नाम पर 2 लाख खर्च दिखा दिए, लेकिन 40 लाख की लागत वाला मुख्य सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट आज भी फाइलों में धूल फांक रहा है।
अतिक्रमण को अभयदान- राजस्व विभाग ने नदी क्षेत्र में 11 बड़े अतिक्रमणकारियों को चिन्हित कर नोटिस तो जारी किए, लेकिन अब तक एक भी पक्का निर्माण नहीं ढहाया गया। उल्टा, नदी की जमीन पर अब नए निर्माण शुरू हो गए हैं।
इस पूरे मामले पर कलेक्टर पार्थ जैसवाल का कहना है कि उन्होंने सभी नगर निकायों और जनपदों को पुराने रुके हुए कार्यों को जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने जल गंगा संवर्धन के तहत पुराने जलाशयों की पहचान कर उन्हें पुनर्जीवित करने का दावा किया है।