मां ने न केवल खुद को संभाला और शिक्षा के महत्व को समझते हुए अपने बेटों को कठिन हालात में भी पढ़ाया। बेटों को ऐसी शिक्षा दिलाई कि वे आज दो निजी विश्वविद्यालय और 50 से अधिक महाविद्यालय का संचालन कर कई राज्यों में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं।
छतरपुर. मदर्स डे पर हर कोई जीवन में मां की महिमा के बारे में एक बार विचार जरूर करता है। क्योंकि अपने बेटों के लिए सभी मां कुछ विशेष होती हैं। लेकिन कुछ मां अपने बेटों के साथ ही समाज के लिए भी कुछ खास होती हैं। ऐसी ही एक मां छतरपुर की कुंती सिंह हैं। पति के निधन के बाद खुद को संभाल भी नहीं पाई थी कि बेटी भी देवलोक चली गई। दुखों के पहाड़ से टूट चुकी एक मां ने न केवल खुद को संभाला और शिक्षा के महत्व को समझते हुए अपने बेटों को कठिन हालात में भी पढ़ाया। बेटों को ऐसी शिक्षा दिलाई कि वे आज दो निजी विश्वविद्यालय और 50 से अधिक महाविद्यालय का संचालन कर कई राज्यों में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं।
मां की प्रेरणा व शिक्षा से 18 साल की उम्र में बड़े बेटे डॉ. बृजेन्द्र सिंह गौतम ने अध्ययन के साथ-साथ अध्यापन का कार्य शुरू किया। पहले होम ट्यूशन फिर स्कूल की शुरुआत की। छोटे बेटे डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह गौतम ने पत्रकारिता के क्षेत्र में मुकाम बनाया। लेकिन दोनो बेटो और मां के मन में एक ही भाव था कि शिक्षा से ही समाज की दिशा एवं दशा बदली जा सकती है। इसी विचार को मन में लिए हुए छतरपुर में एक शिक्षा महाविद्यालय की स्थापना की। मेहनत, लगन और नेक सोच को लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़े और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में 50 से अधिक महाविद्यालय स्थापित किए। इसके बाद छतरपुर में विश्वस्तरीय सुविधाओं के साथ 100 एकड़ ज़मीन में विश्वस्तरीय श्री कृष्णा विश्विद्यालय की स्थापना की। बुंदेलखंड जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र में इतना वृहद संस्थान स्थापित होने से लाखों लोंगो को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त हुआ है। प्रगति के अगले चरण में आर्यावर्त विश्वविद्यालय भोपाल की स्थापना कर प्रदेश और देश में शिक्षा के क्षेत्र में एक पहचान स्थापित की।
दोनों भाई अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को देते है। कहते हैं, मां का प्रेम और मां की महिमा असीमित है। मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्द में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है, बल्कि आवश्यकता पडऩे पर उसका सबसे बड़ा सहारा बन जाती है। मां ने ही अपने त्याग, बलिदान, अनुशासन और समर्पण भाव से हम दोनों के व्यक्तिव का निर्माण किया। इस जगत में मां ने गुरु बनकर बहुत कुछ सिखाया है। दोनों भाई कहते हैं, मैं अपने मुख से कैसे करूं तेरा गुणगान। मां तेरी ममता में फीका-सा लगता है भगवान।