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बुंदेलखंड के किसानों को बड़ी सौगात, बनेगी ‘218 किमी लंबी’ नहर, 54 गांवों से ली जाएगी जमीन

MP News: देश की सबसे महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना तकनीकी प्रयोग और प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ गई है। अब मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले भू-अर्जन पर संकट मंडरा रहा है।

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218 km long canal construction in bundelkhand under Ken-Betwa Link Project Land Acquisition mp news

218 km long canal construction in bundelkhand (फोटो- Freepik)

MP News: बुंदेलखंड की प्यास बुझाने वाली देश की सबसे महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना (Ken-Betwa Link Project) वर्तमान में तकनीकी उलझनों और प्रशासनिक सुस्ती के दोहरे जाल में फंसी नजर आ रही है। जहां परियोजना के तहत बांध का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है, वहीं दोनों नदियों को जोड़ने वाली मुख्य लिंक नहर एक असफल तकनीकी प्रयोग की भेंट चढ़ गई है। करीब 44 हजार 605 करोड़ रुपए की इस महा-परियोजना में 65 किलोमीटर लंबी सुरंग (टनल) बनाने का जो दांव खेला गया था, वह अब पूरी तरह फेल हो चुका है। नतीजतन, विभाग को अब दोबारा पारंपरिक खुली नहर के मॉडल पर लौटना पड़ रहा है।

ये है परियोजना के सुस्त रफ्तार का कारण

छतरपुर जिले के विकास से जुड़ी इस योजना की कमान पन्ना स्थित अधिकारियों के हाथ में होना भी इसकी सुस्त रफ्तार का बड़ा कारण माना जा रहा है। छतरपुर में इस परियोजना का प्रभार पन्ना ईई उमा गुप्ता के पास है। स्थानीय लोगों और जानकारों का आरोप है कि मुख्यालय पर अधिकारियों की नियमित मौजूदगी न होने से फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही है। ईई का कभी-कभार ही छतरपुर आना विकास की गति पर भारी पड़ रहा है, जिसका सीधा असर धारा 19 की रुकी हुई कार्यवाही पर पड़ रहा है।

एक्सपेरिमेंट ने बर्बाद किए कीमती दो साल

परियोजना से जुड़े सूत्रों के अनुसार शुरुआत में अधिकारियों ने 218 किलोमीटर लंबी लिंक नहर के एक बड़े हिस्से (लगभग 65 किमी) को भूमिगत सुरंग के जरिए ले जाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रयोगात्मक मॉडल के पीछे तर्क दिया गया था कि इससे भूमि अधिग्रहण कम होगा और पानी का वाष्पीकरण रुकेगा।

हकीकत के धरातल पर यह योजना अत्यधिक महंगी और जोखिम भरी साबित हुई। लंबे समय तक चले विचार-मंथन के बाद अंततः इस टनल प्रस्ताव को अव्यावहारिक मानकर निरस्त कर दिया गया है। इस तकनीकी हेर-फेर के चक्कर में परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से लिंक नहर का काम दो साल पिछड़ गया है।

वर्कलोड बना बहाना

इस पूरे मामले पर परियोजना के एसई नवीन गौड़ का कहना है कि अन्य कार्यों के दबाव के कारण लिंक नहर की प्रक्रिया में देरी हुई है। हालांकि, उन्होंने भरोसा दिलाया है कि विभाग मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले कार्यवाही पूरी कर लेगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब उत्तर प्रदेश ने इसी समय सीमा में अपना काम पूरा कर लिया, तो मध्य प्रदेश का छतरपुर जिला तकनीकी प्रयोगों और प्रशासनिक लापरवाही की वजह से पीछे क्यों रह गया?

मार्च तक भू-अर्जन की कार्रवाई शुरू नहीं हुई तो प्रक्रिया होगी निरस्त

नहर निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अब खतरे में है। नियमों के मुताबिक धारा 11 (प्रारंभिक अधिसूचना) जारी होने के एक वर्ष के भीतर धारा 19 (अंतिम घोषणा) की कार्यवाही अनिवार्य है। छतरपुर में धारा 11 जारी हुए दो साल बीत चुके हैं, लेकिन टनल और खुली नहर के विवाद में धारा 19 की फाइल अब तक धूल फांक रही है।

सरकार नै एक साल की अतिरिक्त मोहलत तो दी है, लेकिन इसकी अंतिम समय सीमा मार्च 2026 निर्धारित है। यदि अगले कुछ महीनों में भू-अर्जन की ठोस कार्रवाई शुरू नहीं हुई, तो पूरी प्रक्रिया स्वतः निरस्त हो जाएगी, जिससे परियोजना को फिर से शून्य से शुरू करना पड़ेगा।

54 गांवों की 1488 हेक्टेयर भूमि करनी होगी अधिग्रहित

  • लिंक नहर का भविष्य अब फिर से छतरपुर जिले के किसानों की जमीनों पर टिक गया है। यह नहर जिले के 54 गांवों से होकर गुजरेगी।
  • छतरपुर ब्लॉक के 17 गांव (ईशानगर, दिदौल, राजापुरवा, बंधीकला आदि) राजनगर ब्लॉक के 11 गांव (गंज, कर्री, पहरा, सीलोन आदि) महाराजपुर तहसील के 12 गांव मऊ, नुना, पड़वाहा आदि)
  • नौगांव ब्लॉक के 7 गांव (लुगासी, नयागांव, निंदनी आदि) सटई तहसील के 5 गांव (करोदिया, दिदौनियां आदि)
  • इस नहर के लिए कुल 1488.42 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिसमें से अधिकांश निजी भूमि है। किसान पिछले दो वर्षों से अपनी जमीनों के भाग्य का फैसला होने का इंतजार कर रहे हैं। (MP News)