300 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल आज भी न्यूरोलॉजिस्ट और एमआरआई मशीन से वंचित है। जबकि हर महीने यहां 50 से 100 मरीज मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए पहुंचते हैं।
मध्यप्रदेश के बड़े जिलों में गिने जाने वाले छतरपुर का जिला अस्पताल सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। 300 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल आज भी न्यूरोलॉजिस्ट और एमआरआई मशीन से वंचित है। जबकि हर महीने यहां 50 से 100 मरीज मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए पहुंचते हैं। मजबूरी में उन्हें ग्वालियर, झांसी, सागर या जबलपुर रेफर किया जा रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जिले के छह विधायक अब तक इस गंभीर समस्या को सदन में उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं।
पिछले साल उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने घोषणा की थी कि प्रत्येक जिला अस्पताल में एमआरआई मशीन लगाई जाएगी। लेकिन घोषणा का हश्र वही हुआ जो अक्सर योजनाओं का होता है, आज तक न मशीन खरीदी गई और न ही न्यूरोलॉजिस्ट के पद स्वीकृत हुए। नतीजा यह है कि जिला अस्पताल के मरीज अब भी इधर-उधर भटक रहे हैं।
अस्पताल में रोजाना औसतन छह से आठ एक्सीडेंटल केस आते हैं। इनमें से अधिकांश को हेड इंजरी होती है, जिनके इलाज में तत्काल एमआरआई और विशेषज्ञ डॉक्टर की राय अनिवार्य है। ब्रेन ट्यूमर, ब्रेन स्ट्रोक और माइग्रेन के गंभीर मामलों में भी यही स्थिति है। मरीजों की जान बचाने के बजाय उन्हें रेफर कर दिया जाता है। कई बार देर से जांच होने के कारण स्थिति बिगड़ जाती है।
बजरंग नगर की महिला श्वाति मिश्रा ने बताया कि उनकी 10 वर्षीय बच्ची को डॉक्टर ने एमआरआई कराने को कहा, लेकिन छतरपुर में सुविधा न होने के कारण उन्हें सागर तक जाना पड़ा। वहीं बड़ामलहरा से आए दिलीप अग्रवाल ने कहा कि हर बार सैकड़ों किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। गरीब मरीजों के लिए यह यात्रा जांच से कहीं ज्यादा महंगी साबित होती है। कई लोग पैसे की कमी से जांच अधूरी छोड़ देते हैं और गंभीर बीमारी का समय रहते पता नहीं चल पाता। उन्हें हड्डी रोग विशेषज्ञ ने एमआरआइ कराने की सलाह दी तो उन्हें भी सागर जाना पड़ा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि छतरपुर संभागीय दृष्टि से अहम जिला है, जहां रोजाना सडक़ हादसों और ब्रेन डिजीज के मरीज सामने आते हैं। यहां न्यूरोलॉजिस्ट और एमआरआई मशीन न होना सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरपी गुप्ता ने बताया कि जिला अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट का पद ही स्वीकृत नहीं है। इसके लिए शासन को पत्र लिखा जाएगा। उनका कहना है कि मेडिकल कॉलेज खुलने के बाद सुविधाएं मिलने की संभावना है। लेकिन तब तक मरीजों को बाहर के शहरों की धूल फांकनी पड़ेगी। छतरपुर के इस हाल ने स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है। सवाल यह है कि आखिर जिले के छह विधायक और जनप्रतिनिधि कब तक चुप रहेंगे और कब तक मरीजों को ग्वालियर-झांसी भटकने के लिए मजबूर किया जाएगा।