जिले में कई जगह बुनकरों का काम हुआ कम, अब हमारी जिम्मेदारी
छिंदवाड़ा. महात्मा गांधी के सपनों के तहत स्थापित खादी वस्त्र का कारोबार जिले में फिर से फल-फूल सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि हम सभी स्वदेशी को बढ़ावा दें और खादी वस्त्रों को पहनें। इससे महात्मा गांधी ने कुटीर उद्योग के जरिए आर्थिक समृद्घि का जो सपना देखा था, वह पूरा होगा। खादी वस्त्र शरीर के लिए भी अच्छा होता है। वहीं खादी ग्रामोद्योग संघ क्षेत्र से विलुप्त होने से बच जाएगा। दरअसल खादी वस्त्र निर्माण के कारण लोगों को विरासत में बुनकर का धंधा मिला, लेकिन अब बुनकर उपेक्षित हो रहे हैं। नतीजा लोग इस धंधे को छोडकऱ दूसरे कार्य करने को मजबूर हैं। ऐसी स्थिति में बुनकरों को दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल हो गया है। महात्मा गांधी के सपने को पूरा करने का दारोमदार जिन कंधों पर था, उन बुनकरों को दो वक्त की रोटी भी बमुश्किल ही नसीब हो रही है।
90 के दशक में जिले में लगभग 100 से अधिक बुनकर परिवारों ने सूत कताई और कपड़ा बनाने को अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाने के साथ गांधी के सपने को साकार करने का सिलसिला शुरु किया था। आलम यह था कि हर घर में चरखा आ गया और लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी।
लेकिन वक्त गुजरने के साथ चरखे की रफ्तार कमजोर पडऩे लगी। आज हाल यह है कि बुनकरों के घरों के चरखे बंद पड़े हैं और जो चल रहे हैं वह भी अंतिम सांस ले रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम इन्हें आगे बढ़ाएं और खादी के वस्त्रों को पहनकर किसी के रोजी-रोटी का जरिया बनें।
पत्रिका का आव्हान
पत्रिका द्वारा 77वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘हम खादी की शान’ अभियान चलाया जा रहा है। पत्रिका सभी से आव्हान करती है कि 15 अगस्त को हम सभी खादी के बनें कपड़े पहने और स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल हों। इससे बुनकर भी प्रोत्साहित होंगे। आप हमें खादी कपड़ा पहनकर सेल्फी भी भेजें। इसकी फोटो हम पत्रिका में प्रकाशित करेंगे।
इनका कहना है…
मुझे बुनकरी करते हुए 35 वर्ष हो गए हैं। पहले बुनकरों की स्थिति अच्छी हुआ करती थी। लेकिन अब समस्या हो रही है बुनकरों की ओर शासन द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लोग भी खादी के वस्त्र कम पहन रहे हैं। अगर लोग ध्यान दें तो हम भी अच्छे से हर त्योहार मना सकते हैं।
पिछले 25 वर्षों से बुनकारी का कार्य कर रहा हूं। पहले की स्थिति अच्छी थी। बुनकर अपना व्यवसाय हंसी-खुशी किया करते थे। आय भी काफी अच्छी थी। शासन को बढ़ावा देना चाहिए। इसके अलावा आम लोगों को भी खादी के वस्त्रों को पहनने के लिए प्रेरित करना होगा।
देश की आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक खादी रही है। ऐसा नहीं है कि यह पूरी तरह से खत्म हो गई है। लोग आज भी खादी के वस्त्र पहनते हैं। युवाओं में क्रेज बढ़ रहा है। हां यह जरूर है कि इसे और बढ़ावा मिलना चाहिए।
खादी स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सच्चा भारतीय होने की पहचान भी है। पत्रिका का अभियान सराहनीय है। खादी के वस्त्रों को बढ़ावा मिलना चाहिए। इससे बुनकर भी प्रेरित होंगे और रोजगार का सृजन होगा।
राजेश गढ़ेवाल, वकील