चित्तौड़गढ़

राजस्थान में ‘खाकी का वफादार साथी’ गायब, अपराधियों के गिरेबान तक पहुंचना हुआ मुश्किल

Dog Squad Crisis: प्रदेश में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है इससे पुलिस की नींद उड़ गई है। ऐसे में अपराधियों की गर्दन तक पहुंचने वाला पुलिस का सबसे भरोसेमंद और 'जांबाज' डॉग स्क्वायड खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

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डॉग स्क्वायड, चित्तौड़गढ़

Dog Squad Crisis: प्रदेश में अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है इससे पुलिस की नींद उड़ गई है। ऐसे में अपराधियों की गर्दन तक पहुंचने वाला पुलिस का सबसे भरोसेमंद और 'जांबाज' डॉग स्क्वायड खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। चित्तौड़गढ़ समेत प्रदेश के कई जिलों में हालात इतने बदतर हैं कि संगीन वारदातों के बाद मौके पर सुराग तलाशने के लिए अपना कोई खोजी श्वान नहीं है। भीलवाड़ा पुलिस लाइन स्थित डॉग स्क्वायड के केनल (श्वान गृह) पर आज ताले लटके हुए हैं, जो जिले की सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़ी खामी को उजागर कर रहे हैं।

पुलिस अनुसंधान में डॉग स्क्वायड की भूमिका रीढ़ के समान होती है, विशेषकर उन मामलों में जहां वैज्ञानिक साक्ष्य कम हों। लेकिन कई जटिल वारदातों को चंद घंटों में हल करने वाला यह डॉग स्क्वायड अब फाइलों में सिमट गया है, जिसका सीधा असर प्रभावित जिलों की पुलिस जांच और अनुसंधान प्रक्रिया पर पड़ रहा है। भीलवाड़ा जिले में तो खोजी श्वान 'कुटीपी' व 'डेल्टा' की मौत के बाद से रिजर्व पुलिस लाइन के डॉग स्क्वायड को नए श्वान का इंतजार है।

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डेल्टा व कुटीपी जैसे खोजी श्वानों की कमी

भीलवाड़ा में वर्ष 2015 में कुटीपी की मौत के बाद डेल्टा ने डॉग स्क्वायड में जगह ली थी, लेकिन वर्ष 23 में मौत के बाद से डॉग स्क्वायड सूना है। भीलवाड़ा के पड़ोसी जिले चित्तौड़गढ़, राजसमंद के साथ ही प्रतापगढ़ जिले के पुलिस महकमे का डॉग स्क्वायड भी सूना पड़ा है।

चित्तौड़गढ़ में खोजी श्वान की 9 मार्च 2025 को मौत हो जाने के बाद से स्कवायड सूना है। प्रतापगढ़ जिले के पुलिस महकमे को सालों से खोजी श्वान का इंतजार है। इसी प्रकार राजसमंद जिले में वर्ष 2010 से नहीं है। तीनों जिलों में संगीन वारदात होने और सार्वजनिक स्थल व इमारतों में बम की सूचना होने पर खोजी श्वान मुख्यत: उदयपुर से ही बुलाए जाते हैं।

पड़ोसी जिलों के डॉग स्क्वायड का सहारा

पुलिस विभाग ने नए श्वान की मांग तो की, लेकिन लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी भीलवाड़ा को नया खोजी साथी नहीं मिल पाया। आलम यह है कि हत्या, चोरी और डकैती जैसी बड़ी वारदातों के बाद जब मौके पर साक्ष्य जुटाने की बात आती है, तो स्थानीय पुलिस को पड़ोसी जिलों के डॉग स्क्वायड पर निर्भर रहना पड़ता है। जब तक दूसरे जिले से टीम भीलवाड़ा पहुंचती है, तब तक कई बार महत्वपूर्ण सुराग नष्ट हो जाते हैं या अपराधी पुलिस की पहुंच से कोसों दूर निकल जाते हैं।

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