सुधर्मा सभा में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि पूर्व कर्मों के क्षय के लिए आदमी को इस शरीर को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए इस शरीर टिकाए रखने का प्रयास होना चाहिए अर्थात् जीवन जीने का परम लक्ष्य होता है, मोक्ष की प्राप्ति।
कार्यक्रम में योगक्षेम वर्ष में प्रशिक्षण सहित होनेवाले विविध कार्यक्रमों के लिए अलग अलग जिम्मेदारी सौंपी गई जिसके क्रम में मुख्य मुनि महावीर कुमार को जैन दर्शन, अणुव्रत, जीवन विज्ञान आदि के संदर्भ में प्रशिक्षण का जिम्मा सौंपा गया है। कार्यक्रम में प्रेक्षाध्यान के संदर्भ में साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा ने अवगति प्रदान की। साध्वीवर्या संबुद्धयशा ने इस दौरान होने वाले ज्ञान के कुछ उपक्रमों की जानकारी दी।
कर्मों से मुक्त रहने के लिए करते हैं साधना
सुधर्मा सभा में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि पूर्व कर्मों के क्षय के लिए आदमी को इस शरीर को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए इस शरीर टिकाए रखने का प्रयास होना चाहिए अर्थात् जीवन जीने का परम लक्ष्य होता है, मोक्ष की प्राप्ति। चारित्रात्माएं जो घर-परिवार को त्यागकर संयम को स्वीकार करते हैं। संयोग से विप्रमुक्त हो जाते हैं। उनके लिए सांसारिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। साधु के मालिकाना में कोई बैंक बैलेंस आदि नहीं होता। संयोगों से मुक्त और भिक्षु के रूप में साधु रहते हैं। कर्मों से मुक्त रहने के लिए साधु साधना करता है। संक्षेप में कहा जाए तो पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्तियों की साधना करने वाला साधु अपने पूर्वकृत कर्मों से मुक्त होने का प्रयास करता है। साधुपन का पालन भी अखण्ड रूप में होता है। हमारी समितियां, गुप्तियां साधना की दृष्टि से बहुत आवश्यक होती हैं। सभी अपने-अपने नियम और आचार के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।
इस अवसर पर आचार्य ने जैन दर्शन, प्रेक्षाध्यान आदि संदर्भित विषयों पर साध्वियों व समणियों को प्रशिक्षण आदि की जिम्मेदारी बहुश्रुत परिषद सदस्य साध्वी कनकश्री को सौंपी। मुनि कुमारश्रमण संतों व पुरुषों के प्रेक्षाध्यान का, मुनि योगेशकुमार तत्त्वज्ञान के संदर्भ में ध्यान दे सकते हैं। साध्वी स्तुतिप्रभा ने गीत का संगान किया। साध्वी निर्णयप्रभा साध्वी शशिप्रज्ञा व साध्वी रोशनीप्रभा ने विचार व्यक्त किए।