धमतरी

कभी बैलों की टाप से गूंजता था धमतरी, अब पूजा तक सिमटा पोला… बदल गई पर्व की तस्वीर

Pola Tradition: कभी पोला सिर्फ बैलों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि किसान, पशुधन और पूरे समाज के एक साथ आने का उत्सव हुआ करता था। समय के साथ खेती, जीवनशैली और मनोरंजन के तौर-तरीके बदले तो पोला मनाने का अंदाज भी बदल गया।
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Sep 06, 2026
Chhattisgarh News
कभी बैलों की टाप से गूंजता था धमतरी (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Pola Festival: पोला कभी सिर्फ बैलों की पूजा का पर्व नहीं था। यह खेत, किसान, पशुधन और पूरे समाज के एक साथ आने का दिन था। धमतरी के रूद्री रोड स्थित लक्ष्मी निवास इसका सबसे पुराना गवाह रहा है। करीब 107 साल पहले, वर्ष 1919 में बने इस परिसर में पोला पर बैल दौड़ का आयोजन होता था। बैलों की टाप के साथ शुरू होने वाली यह दौड़ विंध्यवासिनी मंदिर स्थित राष्ट्रीय गौशाला तक पहुंचती थी और इसे देखने शहर उमड़ पड़ता था। इसी परिसर से धमतरी में रामसत्ता की परंपरा ने आकार लिया, जिसमें कभी 51 गांवों के ब्राह्मण एक साथ जुटते थे।

आज वही पोला कई जगह पूजा-पाठ और औपचारिक आयोजन तक सीमित हो गया है। बैल हैं, पर्व है, पूजा है, लेकिन उस पर्व को समाज का उत्सव बनाने वाली सामूहिकता धीरे-धीरे पीछे छूट गई है। गोकुलपुर वार्ड के पूर्व पार्षद महेश साहू और बुजुर्ग तीजूराम साहू (75), पुनुराम नेताम (78) की स्मृतियों में लक्ष्मी निवास का वह दौर अब भी सुरक्षित है।

उनके मुताबिक, मालगुजारी जमाने में लक्ष्मी निवास के मालिक स्वर्गीय त्र्यंबकराव कृदत्त के नेतृत्व में तीजा-पोला पर लोक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था। बैल दौड़ आकर्षण का प्रमुख केंद्र था। लोग परिवार के साथ पहुंचते, रास्तों और आसपास की जगहों पर खड़े होकर दौड़ देखते और पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता।

वर्ष 1991 के बाद बैल दौड़ और ऐसे कई लोक कार्यक्रम बंद हो गए। इसके साथ पोला के सामुदायिक स्वरूप में भी बदलाव आने लगा। गांवों में भी पहले जैसी बैल दौड़, लोक खेल और सामूहिक सांस्कृतिक गतिविधियां कम होती गईं। पर्व बचा, लेकिन उसके आसपास का सामाजिक जीवन सिकुड़ता गया।

खेती बदली तो पोला का अर्थ भी बदल गया

इस बदलाव की जड़ें केवल त्योहार में नहीं, बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और जीवनशैली में भी हैं। कभी बैल किसान के लिए खेती का सबसे महत्वपूर्ण साथी था। हल चलाने से लेकर खेत की जुताई और परिवहन तक उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिए बैल की पूजा में किसान अपने श्रम और कृषि जीवन के साथी का सम्मान देखता था। अब खेतों में ट्रैक्टर और दूसरी कृषि मशीनों की भूमिका बढ़ गई है।

गांवों की जीवनशैली बदली है। रोजगार और शिक्षा के लिए युवाओं का बाहर जाना बढ़ा है। संयुक्त परिवार छोटे हुए हैं और मोहल्ले की सामूहिकता पहले जैसी नहीं रही। इसका असर त्योहारों पर भी पड़ा है। पहले बच्चे और युवा पोला के आसपास कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, गेड़ी दौड़, रस्साकशी और दूसरे पारंपरिक खेलों में घंटों जुटे रहते थे। खेल मैदान सामाजिक मेल-जोल का केंद्र होते थे। आज मोबाइल गेम, इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन ने बच्चों के खाली समय का बड़ा हिस्सा ले लिया है।

51 ब्राह्मणों से शुरू हुई रामसत्ता की परंपरा

लक्ष्मी निवास की विरासत केवल पोला तक सीमित नहीं रही। बुजुर्गों के अनुसार, धमतरी शहर में रामसत्ता की शुरुआत भी इसी परिसर से हुई। शुरुआती दौर में 51 गांवों के ब्राह्मणों को बुलाया जाता था। न मंचीय तामझाम, न आधुनिक ध्वनि व्यवस्था- रामायण के प्रसंग सामूहिक स्वर में प्रस्तुत किए जाते थे। समय के साथ रामसत्ता ने भी अपना रूप बदला। वर्ष 1965-66 के आसपास इसमें गीत-संगीत जुड़ा। मंडलियां बनने लगीं और रामायण के पात्रों को संगीतमय प्रस्तुति के जरिए जीवंत किया जाने लगा। परंपरा ने समय के साथ खुद को बदला, इसलिए वह बची रही। गोकुलपुर में आज भी रामसत्ता की परंपरा जारी है।

सोशल मीडिया ने उत्सव को मंच दिया, पर सहभागिता का सवाल बाकी

पूर्व पार्षद महेश साहू ने कहा कि सोशल मीडिया ने इस बदलाव को एक और आयाम दिया है। पोला की सजावट, बैलों की तस्वीरें, छत्तीसगढ़ी गीत, लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम अब मोबाइल के जरिए लोगों तक पहुंचते हैं। यह लोक संस्कृति के लिए नया मंच भी है। गांव का छोटा आयोजन भी कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन संस्कृति को जीना अलग बात है।

Updated on:
06 Sept 2026 04:00 pm
Published on:
06 Sept 2026 03:59 pm