धमतरी

Navratri 2024: इस नवरात्रि बिलाईमाता के सिर सजेगा सोने का मुकुट, जानें 250 साल पुराने मंदिर का इतिहास…

Navratri 2024: इस नवरात्र माता को 160 ग्राम स्वर्णजड़ित छत्र, 100 ग्राम स्वर्णजड़ित मुकुट सजाएंगे। इसके अलावा अन्य कार्य भी हो रहे हैं। जनभावना और आस्था को लेकर चढ़ावा व दान के पैसों को मंदिर सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधा में लगा रहे हैं।

2 min read
Oct 02, 2024

Navratri 2024: इस नवरात्र मां बिलाईमाता भक्तों को नए स्वरूप में दर्शन देंगी। माता के सिर पर सोने का मुकुट और ऊपर सोने का छत्र सजेगा। 3 अक्टूबर को नवरात्र के प्रथम दिन सुबह अभिषेक के बाद मुकुट और छत्र सजाया जाएगा। इसके साथ ही मंदिर को भव्य रूप देने युरल आर्ट, मकराना मार्बल, पीओपी जिप्सम सीलिंग, गलीचा सहित अन्य सौंदर्यीकरण कार्य कराए जा रहे। सौंदर्यीकरण के बाद माता के मंदिर में भव्यता, दिव्यता सहित नव्यता नजर आएगी।

बिलाईमाता के सिर पर सजेगा 100 ग्राम सोने का मुकुट

विंध्यवासिनी बिलाई माता मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष आनंद पवार, कोषाध्यक्ष माधवराव पवार, सदस्य सूर्याराव पवार ने बताया कि मंदिर को भव्य रूप देने का कार्य द्रूतगति से चल रहा है। इस नवरात्र माता को 160 ग्राम स्वर्णजड़ित छत्र, 100 ग्राम स्वर्णजड़ित मुकुट सजाएंगे। इसके अलावा अन्य कार्य भी हो रहे हैं। जनभावना और आस्था को लेकर चढ़ावा व दान के पैसों को मंदिर सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधा में लगा रहे हैं। 7 जुलाई 1965 में स्व चंद्रभागा बाई पवार के वंशज स्व आपा साहेब पवार ने लोक न्यास अधिनियम की धारा-415 के तहत पंजीयक लोक न्यास रायपुर के समक्ष मंदिर को लोक न्यास घोषित करने आवेदन प्रस्तुत किया।

विधिवत जांच के बाद पंजीयक लोक न्यास रायपुर ने 23 जनवरी 1974 को आदेश पारित इसे श्री विंध्यवासिनी बिलाई माता मंदिर ट्रस्ट के नाम से लोक न्यास घोषित किया, जिसमें स्व आपा साहेब पवार, स्व त्र्यंबकराव जाधव, स्व भोपालराव पवार, स्व गिरधर राव बाबर, स्व तातोबा पवार और स्व खिलौना महाराज को न्यासी घोषित किया गया। स्व आपा साहेब पवार की मृत्यु पश्चात स्व भोपालराव पवार मंदिर की देखरेख करते रहे। वर्तमान में सभी न्यासियों के वंशज मंदिर को नई ऊंचाई देने में जुटे हैं।

250 साल पुराना है मंदिर

ट्रस्टियों ने बताया कि प्राचीन विंध्यवासिनी मंदिर बिलाई माता के नाम से प्रसिद्ध है। जमीन से दिव्य पत्थर बढ़ते-बढ़ते स्वत: देवी प्रकट हुई। मंदिर का इतिहास लगभग 250 साल पुराना है। प्रथम ट्रस्टी स्व आपा साहेब पवार बताते थे कि पहले यह स्थान बियाबान जंगल था। लगभग 250 साल पहले स्व बापूराव पवार घोड़े में बैठकर इस जंगल की तरफ से निकले थे। इसी दौरान घोड़े का पैर एक दिव्य पत्थर से टकरा गया। पैर से खून बहने लगा। घोड़े से उतरकर पत्थर को साइड करने का प्रयास किया, लेकिन वह दिव्य पत्थर काफी नीचे तक था।

एक भक्त ने मुकुट बनाने 100 तोला सोना दान किया

इस मंदिर में पहले माता जी का मुकुट और छत्र चांदी का था। जिसे अब सोने की परत वाली बनाई गई है। मुकुट में 180 ग्राम एवं छत्र में 160 ग्राम का सोना परत चढ़ाया गया है। मराठा पारा के एक भक्त ने 100 तोला सोना दान में दिया। इसके अलावा तीन अन्य ने भी गुप्त सोने का दान दिया। कुछ भक्त भी सोना चढ़ाए थे। जिसे मुकुट और छत्र तैयार कराया गया है। कापर के ऊपर लगे सोने के मुकुट और छत्र नवरात्र के दिन लगाया जाएगा।

इसी दिन रात्रि में बापूराव पवार को देवी ने स्वप्न में कहा कि मेरे स्थान पर पूजा-अर्चना कर मंदिर का निर्माण किया जाए। घटना के कुछ दिन बाद बापूराव पवार की पुत्रवधु स्व चंद्रभागा बाई पति दीवानजी पवार ने गृहग्राम सटियारा से बड़े-बड़े पत्थर बैलगाड़ी से लाकर मंदिर निर्माण कराया। इन्हीं के नाम पर गर्भगृह की दीवार पर शीलालेख लगी है, जो संस्कृत भाषा में अंकित है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद दिव्य पत्थर धीरे-धीरे ऊपर उठी और सुंदर रूप में दिखने लगी, जिसे हम बिलाई माता के नाम से जानते हैं।

Updated on:
02 Oct 2024 06:40 pm
Published on:
02 Oct 2024 06:38 pm
Also Read
View All

अगली खबर