Bhojshala Temple Creat History: 22 मई को राजा भोज द्वारा निर्मित मां सरस्वती मंदिर 'भोजशाला' में 721 साल का इंतजार खत्म होने वाला है। हिंदू समाज पूर्ण स्वाभिमान के साथ नया इतिहास रचने को तैयार है।
Bhojshala Temple: ऐतिहासिक शहर धार में स्थित राजा भोज द्वारा निर्मित मां सरस्वती मंदिर 'भोजशाला(Bhojshala Temple)' में आगामी शुक्रवार एक नया इतिहास रचने जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की नई गाइडलाइन और इंदौर उच्च न्यायालय के हालिया फैसले के बाद, 22 मई को हिंदू समाज भोजशाला परिसर में पूर्ण स्वाभिमान के साथ प्रवेश करेगा और भव्य महाआरती का आयोजन करेगा। लगभग 721 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद यह पहला मौका होगा जब शुक्रवार के दिन हिंदू समाज को यहां अधिकारपूर्वक पूजन-अर्चन का अवसर मिल रहा है।
आयोजन को लेकर आयोजित एक पत्र परिषद में जानकारी देते हुए हिंदू नेता अशोक जैन ने इसके ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डाला। बताया कि राजा भोज द्वारा निर्मित इस पवित्र मां सरस्वती मंदिर को साल 1305 ईस्वी में मुगल आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने अपवित्र कर इस पर कब्जा कर लिया था। तभी से हिंदू समाज इस मंदिर की मुक्ति और यहां दोबारा पूजन-अर्चन शुरू करने के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा था। उन्होंने आगे कहा कि समयसमय पर कई महापुरुषों ने इस संकल्प को जीवित रखा, जिसका परिणाम आज सबके सामने है।
आंदोलन से जुड़े दीपक बिडकर और सोनू गायकवाड़ ने बताया कि साल 1997 में भोजशाला(Bhojshala Temple) की मुक्ति और इसके गौरव की पुनस्र्थापना के लिए स्वाभिमानी आंदोलनकर्ताओं ने एक बड़ा अभियान शुरू किया था। इस अभियान को कानूनी रूप से बड़ी सफलता तब मिली जब 15 मई शुक्रवार को उच्च न्यायालय इंदौर ने इस पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी। हिंदू नेता जैन के अनुसार इसे एक दैवीय संयोग बताते हुए कहा कि न्यायालय का यह अंतिम फैसला भी शुक्रवार के दिन ही आया, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह स्वयं माता की ही इच्छा थी। इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद पुरातत्व विभाग ने परिसर का नामकरण बदलते हुए केवल 'भोजशाला' कर दिया है और 'कमाल मौला मस्जिद' का नाम वहां से हट चुका है।
हिंदू नेता अशोक जैन के अनुसार हिंदू समाज ने इस ऐतिहासिक दिन को भव्य बनाने के लिए अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। यदि कोई कानूनी या न्यायालयीन अड़चन सामने नहीं आती है तो सकल हिंदू समाज के सभी लोग शहर के धानमंडी चौराहे पर एकत्रित होंगे। धानमंडी चौराहे से सभी श्रद्धालु एकजुट होकर सामूहिक रूप से पैदल यात्रा निकालते हुए भोजशाला मंदिर की ओर प्रस्थान करेंगे। भोजशाला परिसर के भीतर पूर्ण सम्मान और स्वाभिमान के साथ मां सरस्वती का विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया जाएगा और उसके बाद भव्य महाआरती संपन्न होगी। इस आयोजन को लेकर पूरे क्षेत्र के हिंदू समाज में भारी उत्साह देखा जा रहा है और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रशासन भी मुस्तैद है।
दरअसल इससे पहले तक व्यवस्था के तहत शुक्रवार के दिन हिंदू समाज के प्रवेश पर पूरी तरह रोक थी और इस दिन केवल मुस्लिम समाज को ही नमाज पढऩे की अनुमति थी। स्थिति यह थी कि जब कभी शुक्रवार के दिन हिंदुओं का प्रमुख पर्व वसंत पंचमी आता था, तब भी हिंदू समाज को अपमानित होकर और विवादों का सामना करते हुए वहां से हटना पड़ता था। मुगलों और अंग्रेजों के काल से शुरू हुई यह व्यवस्था आजादी के बाद भी अब तक जारी थी, जिसे अब बदल दिया गया है।