
बदनावर. कभी घर के आंगन में नन्ही परी की तरह फुदकने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही दिखती है। जैसे वह रूठ कर कहीं चली गई हो। रूठे भी क्यों न हमने उनके घर ही नहीं छीने, बल्कि उन्हें दाना-पानी देना भी भूल गए और तो और उनके कुदरती भोजन को बर्बाद करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
आज से 25-30 साल पहले तक गौरैया घर-परिवार का एक हिस्सा हुआ करती थी। घर के आंगन में फुदकती गौरैया, उनके पीछे नन्हे-नन्हे कदमों से भागते बच्चे। अनाज साफ करती, मां के पहलू में दुबक कर नन्ही गौरैयों का दाना चुगना और और फिर फुर्र से उड़कर झरोखों में बैठ जाना। ये नजारे अब शहरों में ही नहीं गांवों में भी ज्यादा नहीं दिखाई देते। खेतो में कीटनाशक दवाइयों के उपयोग व कटती हरियाली व मोबाइल टॉवरों के रेडिएशन के कारण गौरैया का जीवन संकट में पड़ गया है। पहले गांवों में बड़ी संख्या में आसमान में उड़ती हुई दिखाई देती थी। लेकिन अब यह नगण्य हो गई है। बदलते वातावरण ने इन्हें हमसे दूर कर दिया है। हालांकि अभी भी पक्षी प्रेमी गौरैया को बचाने के लिए पहल करते रहते है।
परिंदों के लिए बना रखा है आशियाना
स्थानीय गोसेवा संस्थान के सदस्य गौरैया समेत अन्य परिंदों को बचाने के लिए समय-समय पर पहल करते रहते हैं। इसी कड़ी में संस्था द्वारा यहां श्री लक्ष्मी गोशाला परिसर में सात मंजिला पक्षीघर बना रखा है। इसमें परिंदों की चहचहाहट कानों में मधुर संगीत घोल देती है। संस्थाध्यक्ष यशपालसिंह सिसौदिया ने बताया कि बदलते वातावरण व पर्यावरण के कारण परिंदों खत्म हो रहे हंै। इसको लेकर संस्था ने पक्षीघर बनाया है। 60 फीट ऊंचाई के इस पक्षीघर में 650 घौंसले बना रखे है। इसमें करीब 2 हजार परिंदे एक साथ रह सकते है। पक्षीघर में परिंदों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था की जाती है। शाम को गोसेवा संस्थान के सदस्यों ने नागेश्वरधाम समेत अन्य मंदिरों समेत धार्मिक स्थलों पर सकोरे बांधकर उसमें दाना-पानी रखा। ताकि गर्मी के दिनों में परिंदों को आसानी से पानी मिल सके। सकोरे अन्य लोगों को भी वितरित किए गए। इस मौके पर अध्यक्ष यशपालसिंह सिसोदिया, धर्मेंद्र यादव, ऋतुराज सिंह शक्तावत आदि उपस्थित थे।