यहां रानी रूपमती से मिलने आज भी आते हैं बाजबहादुर

मुगल बादशाह अकबर को इस बाजबहादुर और रानी रूपमती की मौत पर बेहद अफसोस हुआ था, उन्होंने बाजबहादुर की मजार पर  ‘आशिक-ए-सादिक’ और और रानी रूपमती की समाधि पर ‘शहीदे-ए-वफा’ की दासतां लिखवा दिया था....।
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Updated: 15 Feb 2016, 11:57 AM IST
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एक करिश्माई प्रेमकहानी
ऐतिहासिक नगरी मांडू का नाम सामने आते ही रानी रूपमती और बाज बहादुर के अमरप्रेम की गाथा सामने आ जाती है। नर्मदा नदी क उत्तर में पहाड़ी पर बसी प्रेमनगरी की खूबसूरती और आबोहवा में भी प्यार बसा हुआ है। यहां का पत्ता-पत्ता इस प्रेम कहानी की गाथा कहता है। माना जाता है कि यहां आज भी दोनों की आत्माएं मिलती हैं और प्रेम के गीत गाती हैं। कभी मालवा की राजधानी रहे मांडू का नाम आते ही मन में स्वरलहरियां गूंजने लगती है।


रानी रूपमती पर बनी थी फिल्म
1957 में रानी रूपमती और बाज बहादुर के प्रेम पर फिल्म भी बनी थी, जिसमें निरुपा राय और भारत भूषण ने इस कहानी को दुनिया के सामने ला दिया। रूपमती फिल्म का आ लौट के आ जा मेरे मीत...तुझे मेरे गीत बुलाते हैं। आज भी मांडू में गुनगुनाया जाता है।


जब विषेला हीरा निकला रानी ने
गुस्से और अहंकार से भरे मुगल बादशाह अकबर ने अपने सिपहसालार आदम खां को मालवा पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफी दिनों तक युद्ध हुआ और अकबर ने छोटी सी सेना वाले बाज बहादुर को कैद कर लिया। इसके बाद अकबर के सिपाही रानी को अपने कब्जे में लेने के लिए मांडू की ओर बढ़े तो यह बात रानी को पता चल गई। इस पर उन्होंने अपने आप को अकबर को सौंपने से अच्छा अपनी जान देना समझा। उन्होंने हीरा निगल लिया था।

rani roopmati

रानी के लिए बना था महल
रानी को बाजबहादुर इतना अधिक चाहते थे कि रानी उनके बिना कुछ कहे ही वो उनके दिल की बात समझ लिया करते थे। बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्यार के साक्षी रहे मांडू में 3500 फीट की ऊंचाई पर बना है यह महल। बताया जाता है कि रानी नर्मदा नदी का दर्शन करने के बाद ही भोजन ग्रहण किया करती थी। रानी की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए बाज बहादुर ने इस महल का निर्माण कराया था और उस पर से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित वह नर्मदा का दर्शन करती थी।

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(यह है रानी रूपमति की समाधि।)


रानी की समाधि पर त्यागे थे बाज बहादुर ने प्राण
जब रानी की मौत की खबर अकबर तक पहुंची तो उसे काफी दुख हुआ और पछतावा हुआ। इसके बाद उसने बाज बहादुर को आजाद कर दिया। बाज ने कहा कि वह वापस सारंगपुर जाना चाहते हैं। सारंगपुर वापस आने पर उन्होंने रानी की मजार पर सिर पटक-पटक कर अपने प्राण त्याग दिए थे। 1568 में सारंगपुर के पास एक मकबरे का निर्माण कराया गया। बाज बहादुर के मकबरे पर अकबर ने ‘आशिक-ए-सादिक’ और रूपमती की समाधि पर ‘शहीदे-ए-वफा’ लिखवाया।


धार जिले में है मांडू
वायुमार्ग- मांडू जाने के लिए इंदौर नजदीकी एयरपोर्ट है। इंदौर भोपाल, ग्वालियर, मुम्बई, दिल्ली और जयपुर से जुड़ा हुआ है। इंदौर से मान्डू की दूरी 99 किलोमीटर है और सड़क मार्ग से यहां पहुंचने में लगभग दो घंटे लगते हैं।

रेलमार्ग- मांडू का नजदीकी रेलवे स्टेशन रतलाम और इंदौर है। यह इंदौर से 99 किलोमीटर और रतलाम से 124 किमी दूर है।

सड़क मार्ग- इंदौर-मांडू मार्ग नियमित रूप से बसों से जुड़ा हुआ है। भोपाल से मान्डू जाने के लिए सीधी बस चलती है। यह भोपाल से 278 किलोमीटर की दूरी पर है।

कब जाएं- मांडू जाने के लिए मानसून सबसे अच्छा समय है। जुलाई से अगस्त के बीच यहां का मौसम खुशनुमा होता है, पूरे मांडू में कोहरे की चादर होती है। धुंध में छुपे पुराने खंडहरों का सौंदर्य निखर जाता है।
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