धौलपुर

सिलिकोसिस बीमारी: पत्थर हुई ‘सहायता’, पति के बाद अब बेटों को खतरा

अयोध्या का राम मंदिर... इससे पहले पुराना संसद भवन और उससे भी पहले दिल्ली का लाल किला। इन जैसी देश की करीब 100 से भी अधिक प्रमुख इमारतों को पत्थर देने वाला धौलपुर जिले का डौमपुरा गांव इन दिनों दर्द और बेबसी की कहानी कह रहा है।

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Aug 20, 2024
धौलपुर. डौमपुरा गांव के महिलाएं, जिनके पति की सिलिकोसिस बीमारी से मौत हो चुकी है।

धौलपुर. अयोध्या का राम मंदिर… इससे पहले पुराना संसद भवन और उससे भी पहले दिल्ली का लाल किला। इन जैसी देश की करीब 100 से भी अधिक प्रमुख इमारतों को पत्थर देने वाला धौलपुर जिले का डौमपुरा गांव इन दिनों दर्द और बेबसी की कहानी कह रहा है। रेड स्टोन के नाम से विख्यात इस पत्थर को खदान से निकालने में लगे कई श्रमिकों के जान से हाथ धोने के बाद आश्रित परिवार को सरकारी सहायता के अभाव में खाने तक के लाले हैं।
जिले के सरमथुरा क्षेत्र में गांव डौमपुरा में आधी उम्र में ही कई लोगों की जिंदगी के लिए यह पत्थर काल बन गया है। इन खदानों में सिलिका युक्त धूल और पत्थरों के बारीक कण के कारण होने वाली सिलिकोसिस बीमारी से यहां श्रमिक अपनी जिंदगी को गंवा रहे हैं। सरकार योजनाओं से लाभ पहुंचाने का दावा भले ही करती हो लेकिन यहां परिवारों को कोई सहायता नहीं मिली। केवल पेंशन के सहारे विधवा महिलाएं परिवार को पालन-पोषण कर रही हैं। ये स्थिति यहां हर पांचवे घर की है।

आदमी चला गया, अब बेटों को नहीं गंवाना

दो हजार की आबादी वाले गांव डौमपुरा में दर्जनों महिलाएं इस बीमारी के चलते विधवा हो चुकी हंै। जो इन पत्थर के खदानों का जख्म झेल रही हैं। पति की मौत के बाद भी ये परिवार यहीं काम करने पर मजबूर हैं। सिलिकोसिस पीडि़त भगवान सिंह बताते है कि गांव में ऐसा एकाध ही घर होगा जिसमें सिलकोसिस से पीडि़त व्यक्ति बीमारी का जख्म नहीं झेल रहा है। गांव में भरोसी, भूरा, श्रीपति, बाबू, नत्थी, रामजी, हरीलाल, होरीलाल, रामचरन, बाबू, लाचारी, प्रकाश, पतिराम, मदौला की सिलिकोसिस से मृत्यु तक हो चुकी है वहीं दो दर्जन लोग पीडि़त हैं। गांव में विधवा महिलाओं को सिर्फ पेंशन ही सहारा है। सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण रोजी रोटी चलाने के लिए अगली पीढ़ी को भीमजबूरन फिर इन खदानों में काम करना पड़ रहा है।

पीडि़तों तक नहीं पहुंच रही सहायता

सिलिकोसिस एक दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारी है, जो खदान क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को हो जाती है। प्रदेश में सिलिकोसिस पीडि़त व्यक्ति को सरकार से 3 लाख की सहायता राशि मिलती है। जबकि मृत्यु होने पर 2 लाख रुपए परिवार को सहायता दी जाती है। लेकिन यहां इन परिवारों को ये सहायता नहीं मिल पाई है। गांव की महिलाओं को केवल विधवा पेंशन मिल रही है जो कि नाकाफी है। बतादें जिले में सिलिकोसिस पीडि़त दो से ढाई हजार मरीज हैं।

सुहाग उजड़ा, फिर सिस्टम ने दिया दर्द

  • विधवा तोफा ने बताया कि उनका एक बेटा सिलिकोसिस से तो एक की अकाल मृत्यु हो गई। अविवाहित बेटे प्रकाश की सिलिकोसिस से मौत हो गई तो तोफा ने छोटे बेटे को खदानों में काम नहीं करने देने पर अड़ गई। बूढ़ी तोफा ने कर्जा लेकर दो नातिनों की शादी तक का भार उठाया है, लेकिन सरकार से कोई मदद नही मिली है। अभी तक घर में बिजली कनेक्शन तक नहीं है।
  • डौमपुरा में अपनी चार बेटी व एक बेटे के साथ रहती हैं। अतरवाई ने अपना दर्द सुनाते हुए कहा कि इनका पूरा जीवन गरीबी में गुजरा लेकिन जिंदगी चल रही है। सिलिकोसिस से पति की मौत के बाद उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बेटियों के साथ मेहनत, मजदूरी कर बच्चों का लालन-पालन किया। पति के जीवित होने पर समाज कल्याण विभाग ने न्यूमोकोनिसिस बीमा के तहत एक लाख की सहायता दी थी। लेकिन पति की मृत्यु के बाद अतरवाई जयपुर तक गुहार लगाने के बाद सहायता राशि के लिए भटक रही है।

अब तक गईं 14 जानें

  • सिलिकोसिस बीमारी से अब तक गांव में 14 लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें शुरुआत में केवल इलाज के लिए 1 लाख रुपए मिले थे। लेकिन मृत्यु के बाद सरकार से मिलने वाली 2 लाख रुपए सहायता राशि नहीं मिली है।
  • गांव में 25 लोग सिलिकोसिस बीमारी से है, जो चल नहीं पाते हैं।
  • राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, डौमपुरा में 172 नामांकन हैं। इसमें 92 छात्रा एवं 80 छात्र हैं। इनमें सिलिकोसिस पीडि़त परिवार के भी बच्चे पढ़ते हैं।
Published on:
20 Aug 2024 10:22 pm
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