हृदय रोग (Heart disease) विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म से पहले ही बच्चे के दिल में किसी तरह की खराबी का पता लगाना सबसे अच्छा होता है, खासकर गर्भावस्था (Pregnancy) के 16-20 हफ्तों के बीच. हर साल भारत में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में से 8 बच्चों को जन्मजात हृदय रोग (Heart disease) (सीएचडी) होता है. ये एक ऐसी बीमारी है जो जन्म से ही मौजूद होती है.
नई दिल्ली: विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease) का पता लगाने का सबसे अच्छा समय उनके गर्भ में ही होता है, खासकर गर्भावस्था (Pregnancy) के 16-20 हफ्तों के बीच। हर साल भारत में जन्म लेने वाले 1000 में से 8 बच्चों को जन्मजात हृदय रोग (Heart disease) होता है। यह जन्म के समय होने वाला सबसे आम विकार है। दुर्भाग्य से, इनमें से केवल 10 प्रतिशत बच्चों को ही समय पर सही इलाज मिल पाता है।
अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के डॉक्टरों के अनुसार, गर्भावस्था के 16-20 हफ्तों (लगभग 4 और एक आधा महीना) के दौरान, अत्याधुनिक अल्ट्रासाउंड इमेजिंग से डॉक्टर बच्चे के विकसित हो रहे दिल की संरचना और कार्य को अच्छी तरह से देख सकते हैं और किसी भी तरह की समस्या का पता लगा सकते हैं।"
डॉक्टर कहते हैं, "इस समय माता-पिता को जरूरी जानकारी मिल जाती है, जिससे वे गर्भावस्था (Pregnancy) के बारे में फैसले ले सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बच्चे के जन्म के बाद समय पर इलाज करवा सकते हैं।"
सबसे आम जन्मजात हृदय रोग (Heart disease) हैं "Ventricular septal defect" और "Atrial septal defect" (जिसे आम तौर पर "Hole in the heart" कहा जाता है)। वहीं, "टेट्रालॉजी ऑफ फालोट" उन बच्चों में ज्यादा पाया जाता है, जिन्हें "सायनोसिस" (ऑक्सीजन की कमी) की समस्या होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित प्रसवपूर्व जांच और अत्याधुनिक इमेजिंग तकनीक से लैस डॉक्टरों से जांच करवाने से गर्भ में ही जन्मजात हृदय रोग (Congenital heart disease) का पता लगाया जा सकता है।
जन्म के बाद दिल की बीमारी का पता लगाने के लिए "Echocardiography" का इस्तेमाल किया जाता है। कभी-कभी सीटी स्कैन और MRI जैसी तकनीकें भी जरूरी हो सकती हैं।
डॉक्टर सुशील आज़ाद, प्रिंसिपल कंसल्टेंट, पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी, अमृता अस्पताल, कहते हैं, "जन्म के बाद दिल की बीमारी का पता चलने पर इलाज का समय दिल की समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है। गंभीर समस्याओं का इलाज जन्म के समय ही करना पड़ता है, जबकि कुछ कम गंभीर समस्याओं का इलाज कुछ महीनों या सालों बाद भी किया जा सकता है।"
उन्होंने यह भी बताया कि इलाज के तरीके बीमारी के प्रकार के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे दवाएं, कैथेटर से इलाज या खुली हृदय की सर्जरी।
अब तो आप भी समझ गए होंगे कि जन्म से पहले ही डॉक्टरी जांच से बच्चों में दिल की बीमारी (Heart disease) का पता लगाकर समय पर इलाज करवाना कितना जरूरी है।