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World Blood Cancer Day 2022: खून की कमी भी कैंसर का हो सकती है कारण, जानिए blood Cancer से जुड़ी हर जानकारी

World Blood Cancer Day 2022: ब्लड कैंसर जब होता है तो ये सीधे कोशिकाओं को प्रभावित करता है। ब्लड कैंसर कई प्रकार के होते हैं। खून की लगातार हो रही कमी भी कई बार कैंसर के संकेत देती है।

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May 28, 2022
Lack of blood anemia also indicates cancer, blood cancer information

ल्यूकेमिया, लिम्फोमा, मायलोमा, मायलोइड्सप्लास्टिक सिंड्रोम (एमडीएस) और मायलोप्रोलिफेरेटिव नियोप्लाज्म (एमपीएन) सहित विभिन्न प्रकार के ब्लड कैंसर होते हैं और नइ सभी के लक्षण भी अलग-अलग होते हैं। लेकिन सभी ब्लड कैंसर रक्त कोशिकाओं के भीतर डीएनए में परिवर्तन के साथ ही शुरू होता है।

हैं और नइ सभी के लक्षण भी अलग-अलग होते हैं। लेकिन सभी ब्लड कैंसर रक्त कोशिकाओं के भीतर डीएनए में परिवर्तन के साथ ही शुरू होता है।
जब ब्लड सेल्स के अंदर डीएनए के साथ कुछ गलत होने लगता है तो सेल्स विकसित नहीं हो पाती हैं और अपना काम भी सही नहीं कर पाती हैं। जब असामान्य सेल्स यानी कोशिकाएं ब्लड में बढ़ती रहती हैं, तो वे स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को काम करने से रोकने लगती हैं और शरीर को संक्रमण से बचा नहीं पाती न ही शरीर की मरम्मत कर पाती हैं।
ब्लड, बोन मैरो मज्जा और लसीका प्रणाली के कैंसर को सामूहिक रूप से ही ब्लड कैंसर कहा जाता है।। जब शरीर का आरबीसी, डब्ल्यूबीसी या प्लेटलेट उत्पादन असामान्य या असामान्य होता है, तो ब्लड कैंसर विकसित होता है। यह सामान्य रूप से अस्थि मज्जा यानी बोनमैरो में शुरू होता है। तो चलिए आज आपको ब्लड कैंसर से जुड़े कुछ मिथ के बारे में बताए ताकि आप इस बीमारे के बारे में सही जानकारी रख सकें।

मिथकः ब्लड कैंसर वाले सभी लोगों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है?
तथ्य: ब्लड कैंसर के सभी रोगियों को बोन मैरो प्रत्यारोपण की आवश्यकता नहीं होती है। अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण यानि बोन मैरो ट्रांसप्लांट कैंसर के प्रकार और व्यक्तिगत रूप से निर्धारित होता है। ट्यूमर, आनुवंशिक प्रोफ़ाइल के आधार पर यह तय किया जाता है। तीव्र ल्यूकेमिया के मामलों तक में कई बार उपचार से ही इलाज हो जाता है।

मिथक: ल्यूकेमिया और ब्लड कैंसर एक ही है?
तथ्य: ब्लड कैंसर तीन प्रकार के होते हैं- ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मायलोमा।

ल्यूकेमिया एक प्रकार का कैंसर है जो सभी श्वेत रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है और उन्हें संक्रमण से लड़ने का अपना प्राथमिक कार्य करने से रोकता है और ये असामान्य कोशिकाएं रक्त में भी पाई जाती हैं। यह आमतौर पर 15 साल से कम उम्र के छोटे बच्चों में देखा जाता है।
लिम्फोमा लसीका प्रणाली और लिम्फ नोड्स का एक कैंसर है जो ज्यादातर लिम्फोसाइटों को प्रभावित करता है, एक प्रकार का सफेद रक्त कोशिका। यह आमतौर पर 15 से 35 वर्ष की आयु के लोगों के साथ-साथ 50 से अधिक उम्र के लोगों में निदान किया जाता है।
मायलोमा कैंसर प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है, जो एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है जो शरीर को संक्रमण से बचाने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करती है। इस कैंसर के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है और संक्रमण का खतरा होता है।

मिथक: रक्त कैंसर एनीमिया के कारण होता है?
तथ्य: एनीमिया उन लोगों में हो सकता है जिन्हें ब्लड कैंसर हो, लेकिन एनिमिया से ब्लड कैंसर नहीं होता। एनीमिया तब विकसित होता है जब शरीर अपनी ऑक्सीजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त लाल रक्त कोशिकाओं या हीमोग्लोबिन का निर्माण नहीं करता पाता है। आरबीसी और ऑक्सीजन का स्तर कम होने पर थकान, शरीर के अंगों के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप करती है। एनीमिया कई चिकित्सा विकारों के कारण हो सकता है, जिनमें से सबसे अधिक आयरन की कमी ही जिम्मेदार होती है।

मिथक: यदि उनके परिवार में कैंसर का इतिहास है, तो कैंसर से बचने की संभावना कम होगी?
तथ्य: कैंसर के पारिवारिक इतिहास वाले अधिकांश व्यक्तियों में कैंसर होने की अधिक संभावना नहीं होती है, लेकिन लिंच सिंड्रोम या बीआरसीए 1/2 म्यूटेशन जैसी स्थितियों के पारिवारिक इतिहास वाले लोगों में ऐसा होता है।

मिथक: ब्लड कैंसर घातक है?
तथ्य: रक्त कैंसर के उपचार अगर सही समय पर हो तो इसमें नाटकीय रूप से सुधार होता है और रोगी पहले से कहीं अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा विधि से कैंसर के इलाज में प्रभावी साबित हो रहे हैं जैसे कि कीमोथेरेपी, रेडिएशन, टारगेटेड थेरेपी/ बायोलॉजिक्स, अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण और इम्यूनोथेरेपी।
तो ब्लड कैंसर का सही समय पर अगर इलाज शुरू हो जाए तो इसे आसानी से कंट्रोल में किया जा सकता है। इससे घबराने की बजाए इसके इलाज पर फोकस करना जरूरी है।

डिस्क्लेमर- आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स और सलाह केवल सामान्य जानकारी प्रदान करते हैं। इन्हें आजमाने से पहले किसी विशेषज्ञ अथवा चिकित्सक से सलाह जरूर लें। 'पत्रिका' इसके लिए उत्तरदायी नहीं है।

Published on:
28 May 2022 10:37 am
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