गाज़ियाबाद

इच्छामृत्यु की मंजूरी: हे भगवान, लंबी उम्र नहीं… बेटे को दर्द से मुक्ति दे दो, पीड़ा देख मां की बदली प्रार्थना

लंबे समय से अचेत अवस्था में जीवन गुजार रहे गाजियाबाद के युवक हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने उनकी हालत को देखते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी और कहा कि जब किसी मरीज के स्वस्थ होने की संभावना नहीं रहती, तब उसे अनावश्यक पीड़ा में बनाए रखना उचित नहीं है।

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गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा 13 साल से कोमा में हैं।

जिन आंखों में बेटे के सुनहरे भविष्य और उसे वेटलिफ्टर बनाने के सपने बसे थे, वही आंखें आज उसकी पीड़ा से मुक्ति की दुआ कर रही हैं। अशोक राणा और निर्मला देवी का बेटा हरीश राणा एक हादसे के बाद पिछले 13 साल से ऐसी अवस्था में है।परिवार के मुताबिक, कभी हंसते-मुस्कुराते और सपनों से भरे हरीश के जीवन पर उस वक्त ग्रहण लग गया, जब वह पोजी की छत से गिर गया। इस हादसे ने उसे ऐसी हालत में पहुंचा दिया, जहां से अब तक कोई सुधार नहीं हो सका।

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ऐसा दिन किसी को न देखना पड़े

माता-पिता ने शुरुआत में बेटे के जल्द ठीक होने के लिए मंदिर-मन्नत सब कुछ किया। हर दिन यही प्रार्थना करते थे कि उनका बेटा फिर से पहले जैसा हो जाए। लेकिन समय के साथ-साथ हरीश की हालत में सुधार नहीं हुआ और उसकी पीड़ा बढ़ती चली गई। बेटे को इस हालत में देख-देखकर माता-पिता का दर्द इतना गहरा हो गया कि उनकी प्रार्थना ही बदल गई। अब मां बेटे के लिए उसके लंबे जीवन नहीं, बल्कि इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति की दुआ करती हैं। निर्मला देवी कहती हैं कि ऐसा दिन किसी माता-पिता को न देखना पड़े, जब उन्हें अपने बच्चे की लंबी उम्र नहीं बल्कि उसके कष्टों से मुक्ति की दुआ करनी पड़े।

हरीश राणा 13 साल से वह अचेत अवस्‍था में

हरीश राणा 13 साल से वह अचेत अवस्‍था में हैं। मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी स्थिति में वर्षों से कोई सुधार नहीं हुआ है और वह केवल चिकित्सकीय पोषण के सहारे जीवित हैं। उनकी देखभाल और इलाज में परिवार सब कुछ गंवा चुका है। बेटे को बचाने की उम्मीद में पिता अशोक राणा ने 2021 में दिल्ली का तीन मंजिला मकान तक बेच दिया और राजनगर एक्सटेंशन के छोटे फ्लैट में आकर रहने लगे।

हरीश के इलाज में हर महीने 40 से 50 हजार रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा एक नर्स की सेवा के लिए 27 हजार रुपये अलग से देने पड़ते हैं।

बेटे की पीड़ा देख परिजनों ने मांगी इच्छामृत्यु की अनुमति

बेटे की पीड़ा देख मानसिक रूप से टूट चुके परिवार ने आखिरकार अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हरीश स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं और वह सर्जरी से लगाए गए पीएफजी ट्यूब के जरिए दिए जाने वाले चिकित्सकीय पोषण पर निर्भर हैं। अदालत ने माना कि यह भी एक प्रकार का मेडिकल उपचार है और यदि यह मरीज के हित में नहीं है तो इसे हटाया जा सकता है।

इसी के साथ अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह पहली बार है जब यह पहली बार है जब अदालत ने 2018 के ऐतिहासिक फैसले के तहत पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की प्रक्रिया को किसी मामले में लागू करने की अनुमति दी है। उस फैसले में अदालत ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।

सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद अब हरीश राणा को आगे की चिकित्सकीय प्रक्रिया के लिए दिल्ली के एम्स ले जाने की तैयारी की जा रही है। डॉक्टरों की टीम मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत जरूरी इलाज और प्रक्रियाएं पूरी करेगी।

फैसले के बाद पिता अशोक राणा ने कहा कि यह फैसला केवल उनके बेटे के लिए नहीं बल्कि उन तमाम परिवारों के लिए उम्मीद है जो वर्षों से असाध्य पीड़ा से जूझ रहे अपनों को देख रहे हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए ऐसा नहीं चाहता, लेकिन जब इलाज की उम्मीद खत्म हो जाती है और सिर्फ कष्ट बाकी रह जाता है, तब यह फैसला राहत देता है।

Updated on:
12 Mar 2026 09:45 am
Published on:
12 Mar 2026 09:11 am
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