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देश में पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत, 13 साल से अचेत पड़े युवक के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दी। यह फैसला 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा के लिए आया है।
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गाज़ियाबाद

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Aman Pandey

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Updated: 11 Mar 2026, 12:55 PM IST

Supreme Court

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गाजियाबाद के रहने वाले Harish Rana के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े हरीश राणा की गंभीर हालत को देखते हुए अदालत ने उन्हें पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दे दी है।

करीब 13 वर्षों से हरीश राणा बेहोशी की स्थिति में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि उनकी बीमारी असाध्य है और सुधार की कोई संभावना नहीं है। इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दे दी।

जानें कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में मरीज की गरिमा और मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है। इसलिए चिकित्सकीय निगरानी और निर्धारित प्रक्रिया के तहत पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाती है। अदालत ने निर्देश दिया कि हरीश राणा को AIIMS के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती कराया जाएगा। यहां चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उनका इलाज धीरे-धीरे वापस लिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया गरिमा और सम्मान के साथ पूरी की जानी चाहिए।

कोर्ट ने हरीश के परिजनों से की थी बात

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के परिजनों से भी विस्तार से बात की थी। उन दोनों ने ही बेटे को इच्छा मृत्यु देने की मांग की थी। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में भी स्पष्ट कहा गया है कि हरीश के स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारडीवाला ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बेहद दुखद परिस्थिति है और अदालत के लिए ऐसा फैसला लेना आसान नहीं है। हालांकि, किसी व्यक्ति को इतने लंबे समय तक असहनीय पीड़ा में जीने के लिए मजबूर रखना भी सही नहीं माना जा सकता।

जानिए हरीश की कहानी

हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई थी। इस हादसे के बाद से ही वह अचेत अवस्था में बिस्तर पर हैं। उसकी आंखें खुली रहती हैं, लेकिन वह किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ है। हादसे के बाद उसकी बॉडी पूरी तरह क्वाड्रिप्लेजिक हो गई है और वह 100 फीसदी दूसरों पर निर्भर हो गया है।

पिछले 13 सालों में उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। मेडिकल रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि लंबे समय तक लगातार बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर कई घाव भी बन गए हैं। डॉक्टरों ने साफ कहा कि उसके ठीक होने की अब कोई संभावना नहीं बची है।

अपने बेटे की यह हालत सालों तक देखने के बाद उसके पिता को मजबूर होकर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। 2024 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने मामले की जांच के लिए प्राइमरी और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड गठित किए, जिनमें एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल थे।

दोनों मेडिकल बोर्डों ने एकमत से कहा कि हरीश की हालत अब अपरिवर्तनीय है। डॉक्टरों के अनुसार, इलाज जारी रखने से सिर्फ उसकी जैविक मौजूदगी (बायोलॉजिकल एक्जिस्टेंस) को लंबा खींचा जा रहा है, जबकि इससे उसे कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा। माता-पिता और मेडिकल बोर्ड दोनों की राय थी कि CAN जैसे लाइफ सपोर्ट को बंद करना ही उसके हित में होगा।

जस्टिस जे.बी. पारडीवाला ने मेडिकल रिपोर्ट को बेहद दुखद बताते हुए कहा कि ऐसे हालात में लड़के को लंबे समय तक इस स्थिति में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब दोनों मेडिकल बोर्ड किसी फैसले पर सहमत हों, तो सामान्य परिस्थितियों में अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, चूंकि यह पहला केस था, इसलिए कोर्ट ने खुद फैसला दिया और स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया गरिमापूर्ण तरीके से की जानी चाहिए।