रक्षाबंधन का पर्व पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है, मगर गाजियाबाद के मुरादनगर के सुराना-सुठारी गांव के छबडिया गौत्र के लोग रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाते हैं। यहां के लोग इसको अपशकुन मानते हैं। ग्रामीण इसके पीछे कहानी को एक वजह बताते हैं।
गाजियाबाद में हिंडन नदी किनारे सुराना गांव बसा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे मुरादनगर विकास खंड का सबसे अधिक आबादी वाले सुराना गांव को पहले सोहनगढ़ के नाम से जाना जाता था। सुराना गांव के बुजुर्ग मास्टर तेजपाल, बालाजी मंदिर के महंत धर्मपाल दास, सुठारी के पीतम सिंह यादव, मा. सुखबीर यादव, कैप्टन इंद्रराज यादव आदि ने बताया कि सुराना-सुठारी गांव में अधिकांश आबादी छबडिया गौत्र के लोगों की है।
पृथ्वीराज चौहान के परिजनों ने डाला था डेरा
ग्रामीणों ने बताया कि उनके पूर्वज 1106 में यहां आए थे। सैकड़ों वर्ष पूर्व राजस्थान से आए पृथ्वीराज चौहान के परिजन छतर सिंह राणा ने हिंडन नदी किनारे डेरा डाला था। उनके पुत्र सूरजमल राणा ने थे। सूरजमल राणा के दो पुत्र विजेश सिंह राणा व सोहरण सिंह राणा थे। विजेश सिंह राणा को घुड़सवारी का शौक था। उन्होंने बुलंदशहर की जसकौर से शादी कर ली थी। वह हिंडन नदी किनारे रहने लगे, तब इसका नाम सोहनगढ़ रखा गया।
मोहम्मद गौरी ने लोगों को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था
उन्होंने बताया कि जब मोहम्मद गौरी को पता चला कि सोहनगढ़ में पृथ्वीराज चौहान के परिजन रहते हैं, तो उसने रक्षाबंधन वाले दिन सोहनगढ़ पर हमला कर औरतों, बच्चों, बुजुर्गों व जवान युवकों को हाथियों के पैरों तले जिंदा कुचलवा दिया था। हमले में विजेश सिंह राणा मारे गए थे, जबकि हमले के वक्त सोहरण सिंह राणा गंगास्नान को गए थे। विजेश सिंह राणा की मृत्यु की खबर मिलते ही उनकी पत्नी जसकौर सती हो गई थी, जिसकी समाधि आज भी गांव में खंडहर हालत में मंदिर के प्रमाण में है।
रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाते हैं छबड़िया गौत्र के लोग
उन्होंने बताया कि इस कारण छबड़िया गौत्र के लोग तब से रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाते। गांव की केवल एक महिला राजवती जिंदा बची थी। सोहरण सिंह राणा की पत्नी राजवती उस वक्त बुलंदशहर के उल्हैड़ा गांव अपने मायके पिता सुमेर सिंह यादव के गई हुई थी। मायके में उसने दो पुत्र लखी व चुपड़ा को जन्म दिया। दोनों का नंदसाल में पालन-पोषण हुआ। बेटों ने बड़े होने पर मां से पिता और अपने परिवार के बारे में पूछा। राजवती ने बेटों को मोहम्मद गौरी द्वारा परिवार के मारे जाने की बात बतार्इ। तब लखी व चुपड़ा के साथ राजवती सोहनगढ़ वापस आईं और गांव को दोबारा बसाया। सोहनगढ़ बसने के वर्षों बाद सुठारी गांव को बसाया गया। सुठारी गांव में छबडिया गौत्र के लोग हैं। वह रक्षाबंधन के पर्व को अपशकुन मानते हैं।
गांव के किसी परिवार में भाई-बहन राखी का पर्व मनाते हैं तो उनके साथ अप्रिय घटना घटित होती है। - तेजराम सिंह यादव, रिटायर्ड अध्यापक, सुराना
एक मान्यता थी कि रक्षाबंधन वाले दिन किसी गांव की महिला बेटा या गाय के बछड़ा पैदा होने पर पर्व मनाया जा सकता है। रक्षाबंधन वाले दिन जयपाल सिंह यादव के यहां पुत्र पैदा हुआ था। परिवार वालों ने खुशी के साथ रक्षाबंधी पर्व मनाया था, लेकिन कुछ दिन बाद ही जयपाल सिंह यादव का पुत्र विकलांग हो गया और बाद में नदी में डूबने से उसकी मौत हो गई थी। -धर्मपाल दास, महंत, श्रीबालाजी मंदिर, सुराना
रक्षाबंधन पर्व की भरपाई पूरी करने के लिए भैयादूज का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भैयादूज पर अधिकतर बहनें गांव सुराना में भाई के घर आती हैं। - महावीर प्रसाद यादव
रक्षाबंधन के पर्व की यह किवंदती कब टूटेगी, इसका बेसब्री से सुराना और सुठारी गांव के लोगों को इंतजार है।- पीतम सिंह यादव, सुठारी