बहन के साथ छेड़खानी ने गैंगस्टर महेंद्र फौजी अंदर ऐसा गुस्सा भड़काया कि उसने उसी दिन तीन हत्याएं कर दीं और यहीं से शुरू हुआ खून का सिलसिला। देखते ही देखते वह 50 से ज्यादा मर्डर कर क्राइम की दुनिया का बड़ा नाम बन गया। आज के क्राइम फाइल में जानिए पूरी कहानी।
मई 1994 की वह तपती दोपहरी आज भी बुलंदशहर के रिकॉर्डस में दर्ज है। आसमान से आग बरस रही थी। जहांगीरपुर के घने जंगल में सन्नाटा इतना था कि सूखे पत्तों के गिरने तक की आवाज किसी धमाके जैसे सुनाई दे रही थी। पेड़ों की ओट में पुलिसकर्मी पसीने से लथपथ मुस्तैद थे। उनकी सासें थमी हुई थी और नजरें सामने से आने वाली कच्ची सड़क पर। खबर पक्की थी कि दशको तक पुलिस की नींद उड़ाने वाला सेना से रिटायर्ड होकर अपराधी बना महेंद्र फौजी इसी रास्ते से गुजरने वाला था। प्लान साफ था… फौजी को जिंदा पकड़ना है।
इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं जब दूर से इंजन की आवाज आई। धीरे-धीरे एक सफेद एम्बेसडर कार नजर आई। दारोगा ने फुसफुसाकर कहा, यही है… तैयार रहो। उन्होंने अपने बगल में खड़े सिपाही से धीरे से पूछा कि क्या सड़क पर कांटे बिछा दिए गए हैं? लेकिन सिपाही की चुप्पी ने दारोगा के होश उड़ा दिए। सड़क पर कांटे डालना भूल गए थे। कुछ सेकेंड के लिए पूरी योजना डगमगा गई। अब एक ही रास्ता था…गोली। दरोगा ने तुरंत रणनीति बदली और दो सिपाहियों को नीचे उतरकर गाड़ी के टायर पर गोली मारने का आदेश दिया ताकि फौजी को जिंदा पकड़ा जा सके।
जंगल की खामोशी में अचानक खूनी मुठभेड़ में बदल गया। जैसे ही संदिग्ध एम्बेसडर कार पुलिस के करीब पहुंची, सिपाहियों ने तुरंत निशाना साधकर फायरिंग शुरू कर दी। गोलियां चलीं, लेकिन निशाना चूक गया। एम्बेसडर के भीतर बैठे महेंद्र फौजी ने पलक झपकते ही अपनी AK-47 की नली बाहर निकाली और गोलियों की बौछार कर दी। देखते ही देखते दो सिपाही जमीन पर गिर पड़े। उनका सीना गोलियों से छलनी हो चुका था। जंगल अब सन्नाटे में नहीं, बल्कि चीख-पुकार और गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज रहा था। वायरलेस पर संदेश गूंजा कि तुरंत मदद भेजी जाए, दो साथी शहीद हो गए हैं। दुश्मन के पास आधुनिक हथियार हैं।
अपने साथियों को आंखों के सामने गिरता देख पुलिसवालों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब फौजी को जिंदा पकड़ने का ख्याल दिमाग से निकल चुका था। ऊपर पोजीशन लिए पुलिसकर्मियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। करीब आधे घंटे तक चले इस मुठभेड़ में अचानक दूसरी तरफ से फायरिंग बंद हो गई और एक डरावनी खामोशी छा गई। दारोगा अचल सिंह और उनकी टीम राइफलें ताने धीरे-धीरे कार की ओर बढ़ी।
जब पुलिस कार के पास पहुंची, तो ड्राइवर की सीट के पास एक आदमी लहूलुहान पड़ा था। एक गोली उसकी टांग की हड्डी चीरकर निकल गई थी और दूसरी उसकी पीठ में धंसी थी। वह कोई और नहीं महेंद्र फौजी था। पक्की तसल्ली करने के लिए दारोगा ने दो और गोलियां चलाने का आदेश दिया, लेकिन शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। 50 से ज्यादा हत्याओं, अनगिनत लूट और अपहरण की वारदातों को अंजाम देने वाला फौजी अब मिट्टी में मिल चुका था।
कहानी की शुरुआत 1982 से होती है। पश्चिमी यूपी के गाजियाबाद के मेवला-भट्टी गांव का महेंद्र सिंह गुर्जर… जिसे लोग महेंद्र फौजी कहते थे। आर्मी से रिटायर, गुस्से में तेज और इगो में खतरनाक। एक दिन उसकी बहन रोती हुई घर आई। रोते हुए देखकर महेंद्र ने पूछा तो बताया कि रास्ते दो लड़कों ने पहले मजाक में बोला कि छू लूं। मना करने पर कहा कि ना सुनना हमें पसंद नहीं और दुपट्टा खींचा। फौजी ने सिर्फ सुना…और फैसला कर लिया। कुछ ही देर में वो अपने दोस्त सतबीर के साथ उन लड़कों के घर पहुंचा। पहले बेरहमी से पीटा… फिर जमीन पर थूक चटवाया। दोनों गिड़गिड़ाने लगे नहीं भाईसाब, मत मारो… गलती हो गई हमसे। ये सुनते ही महेंद्र हसने लगा और फिर बोला …मुझे भी ना सुनना पसंद नहीं है। इसके बाद दोनों को गोली मार दी। इतना ही नहीं, उनकी मां को भी गोली मार दी।उस दिन तीन हत्याएं हुईं…और उसी दिन पैदा हुआ एक खूंखार अपराधी।
दिल्ली और वेस्ट यूपी में जमीनों का खेल चरम पर था। लोनी का चेयरमैन जगमाल सिंह… और उसका सबसे भरोसेमंद आदमी था महेंद्र फौजी। लेकिन एक दिन पैसों को लेकर तकरार हुई। जगमाल ने सबके सामने फौजी को बेइज्जत किया। एक रुपया नहीं दूंगा… जो करना है कर ले। फौजी चुप रहा… लेकिन अंदर आग लग चुकी थी। कुछ दिन बाद उसका घर लूट लिया गया। फौजी को यकीन था… ये काम जगमाल का है। उसने उसी रात फैसला लिया। कल सुबह… जगमाल मरेगा।
अगले दिन, सुनसान सड़क पर फौजी और उसके साथियों ने जगमाल की गाड़ी को घेरा और ताबड़तोड़ गोलियां चलीं। फौजी ने दरवाजा खोला तो जगमाल लहूलुहान पड़ा था। फौजी ने लाश को देखा…और कहा…अब पता चला… मैं कौन हूं।