वक्त बदला तो चाय की दुकान को इसके मालिकों ने होटल में तब्दील कर दी
महात्मा गांधी गोरखपुर की धरती पर सिर्फ एक बार ही आए। लेकिन उनकी एक आवाज पर यहां के हजारों लोग जंग-ए-आजादी में कूद पड़े थे। बापू से जुड़ी तमाम यादें यहां आज भी इस बात की गवाही देती हैं कि महान लोग हमारे जीवन में, आचरण में हमेशा से जीवित रहते हैं। गोरखपुर का गांधी टी-स्टाॅल आज की तारीख में गांधी-मुस्लिम होटल आज भी उन क्षणों को समेटे हुए है जब बापू का कांग्रेसियों ने इसी होटल के पास स्वागत किया था।
यह उन दिनों की बात है जब महात्मा गांधी देश को आजाद कराने के लिए निकल पड़े थे। वह असहयोग आंदोलन को धार देने के साथ अवध के किसान आंदोलन के लिए पूरे देश में जागृति पैदा कर रहे थे। बिहार से बनारस जाते समय महात्मा गांधी का गोरखपुर में भी रूकना हुआ था। जानकार बताते हैं कि बापू ने यहां एक सभा भी की थी।
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इतिहास के पन्नों में दर्ज जानकारी के अनुसार वह तारीख 8 फरवरी 1921 थी। हजारों की संख्या में लोग गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर बापू की एक झलक पाने के लिए मीलों चलकर यहां पहुंचे थे। हर ओर महात्मा गांधी और भारत माता की जय के जयकारे लग रहे थे। जानकार बताते हैं कि ट्रेन के पहुंचते ही भीड़ का जोश शबाब पर पहुंच चुका था। हर ओर महात्मा गांधी के नारे, उनकी एक झलक पाने की बेताबी, उनके पैर छूने की कोशिश।
ट्रेन से निकलते ही बापू ने सबका अभिवादन किया। इसी बीच क्रांतिकारी सहयोगियों में किसी ने वहीं पर एक चादर बिछा दी। फिर लोग अपने हैसियत से बढ़कर सहयोग करने लगे। जिसके पास जो था, वह वहां रखता गया।
स्टेशन से महात्मा गांधी को गोरखपुर में एक जनसभा को संबोधित करने जाना था। बालेमियां के मैदान में सभा आयोजित थी। पैदल ही बापू निकल लिए। बिना किसी तामझाम के वे जनसभा में जाने लगे। जनसभा के जाने के पहले कांग्रेसियों ने एक चाय की दुकान के पास उनके स्वागत का कार्यक्रम रखा था।
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बख्शीपुर के पास स्थित इस चाय की दुकान पर बापू रूके, उनका स्वागत हुआ। फिर इसके बाद इस चाय की दुकान का नाम ही गांधी टी-स्टाॅल हो गया। करीब डेढ़ दशक पहले इस टी-स्टाॅल को होटल में तब्दील कर दिया गया। अब इसका नाम गांधी मुस्लिम होटल हो गया।
लोग बताते हैं कि आजादी की लड़ाई के दौरान यहां क्रांतिकारी आते-जाते थे। विचार-विमर्श होता था।
इस होटल के संचालक अहमद रजा बताते हैं कि जब यह चाय की दुकान हुआ करती थी तो यहां चारों ओर आबादी बेहद कम थी। लेकिन उस समय काफी लोग यहां आते थे। अहमद बताते हैं कि उनके बालिद बताते थे कि यहां अनेक विचारधाराओं के लोग आते चाय की चुस्कियों पर चर्चा करते।