
ग्वालियर. हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर याचिका दाखिल करने वाले एक चिकित्सक को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट के इस फैसले के बाद डॉक्टर को शिवपुरी मेडिकल कॉलेज में 14.45 लाख रुपए जमा कराने होंगे। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की कि जो व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, उसे साफ नीयत (क्लीन हैंड्स) से आना चाहिए और सभी प्रासंगिक दस्तावेज अदालत के सामने रखने चाहिए। याचिकाकर्ता ने जिस बॉन्ड-पत्र (अंडरटेङ्क्षकग) की शर्तों को खुद स्वीकार कर पीजी की अनुमति ली थी, उसे याचिका में पेश नहीं किया।
ग्वालियर निवासी डॉ. आशीष चेतन दीवान की नियुक्ति अप्रैल 2018 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया मेडिकल कॉलेज, शिवपुरी में फोरेंसिक मेडिसिन विभाग में डिमॉन्स्ट्रेटर (प्रदर्शक) के पद पर हुई थी। नियुक्ति के समय उन्होंने तीन वर्ष की निरंतर सेवा देने और बीच में पद छोडऩे पर एक वर्ष का वेतन जमा करने का बांड-पत्र भरा था। इसके बाद डॉ. दीवान को आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज, उज्जैन से रेस्पिरेटरी मेडिसिन में एमडी (पीजी) करने की सशर्त अनुमति इस आधार पर मिली कि वे एनएमसी के निरीक्षण के दौरान उपलब्ध रहेंगे और शेष बांड अवधि पूरी करेंगे। पीजी पूरी करने के बाद वे अगस्त 2023 में टीबी एवं चेस्ट विभाग में सीनियर रेजिडेंट के पद पर नियुक्त हुए और 31 दिसंबर 2025 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
कॉलेज प्रबंधन ने थमाया था वसूली का नोटिस
ठ्ठ इस्तीफे के बाद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने शर्तों का उल्लंघन पाए जाने पर 30 मई 2026 को आदेश जारी कर डॉ. दीवान को 14,45,904 रुपए जमा कराने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ डॉक्टर ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दलील दी कि उन्होंने पीजी से पहले और बाद की अवधि मिलाकर तीन साल से अधिक सेवा पूरी कर ली है, इसलिए वसूली का आदेश असंवैधानिक और रद्द करने योग्य है।
ठ्ठ सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने कॉलेज प्रबंधन द्वारा जारी वसूली आदेश को तो चुनौती दी, लेकिन जिस बांड-पत्र के आधार पर यह मांग की गई थी, उसे याचिका के साथ संलग्न ही नहीं किया। उक्त दस्तावेज शासन और कॉलेज प्रबंधन ने रिकॉर्ड पर पेश किया।