ग्वालियर

कागजों में ‘फिट’, सड़कों पर ‘अनफिट’: ग्वालियर में चल रहा बसों की फिटनेस का ‘खेला’

परिवहन विभाग का दावा है कि बसों की फिटनेस प्रक्रिया अब पूरी तरह ऑनलाइन, पारदर्शी और हाईटेक हो चुकी है। फिटनेस सेंटरों पर सेंसर लगे हैं, ब्रेक टेस्टिंग मशीनें हैं और सीसीटीवी कैमरों की डिजिटल
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Updated: 21 May 2026, 5:48 PM IST
Gwalior ‘unfit’ bus
Gwalior ‘unfit’ bus
  • हाईटेक मशीनों और कैमरों की नाक के नीचे कबाड़ को मिल रहा सर्टिफिकेट
  • हादसे के बाद खुलती है पोल, तब तक दांव पर रहती हैं हजारों जिंदगियां

ग्वालियर. परिवहन विभाग का दावा है कि बसों की फिटनेस प्रक्रिया अब पूरी तरह ऑनलाइन, पारदर्शी और हाईटेक हो चुकी है। फिटनेस सेंटरों पर सेंसर लगे हैं, ब्रेक टेस्टिंग मशीनें हैं और सीसीटीवी कैमरों की डिजिटल निगरानी में जांच होती है। नियम कहते हैं कि बस में सुई के बराबर भी तकनीकी खामी हो, तो उसे फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जा सकता। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। बड़ा सवाल यह है कि यदि सिस्टम इतना ही चाक-चौबंद है, तो सड़क हादसों के बाद जब उन्हीं फिट बसों की जांच होती है, तो वे हर बार अनफिट क्यों निकलती हैं?

हादसों के बाद खुलती है पोल: घिसे टायर और फेल ब्रेक के सहारे सफर

हाल के दिनों में हुए कई सड़क हादसों के बाद जब परिवहन विभाग ने औचक चेकिंग की, तो डरावनी तस्वीर सामने आई। फिटनेस सर्टिफिकेट जेब में लेकर दौड़ रही बसें असल में मौत के जाल जैसी थीं। कई बसों के टायर पूरी तरह घिस चुके थे, जो किसी भी वक्त फटने के लिए तैयार थे। आपातकालीन द्वार (इमरजेंसी गेट) जाम मिले और अग्निशमन यंत्र वर्षों पहले एक्सपायर हो चुके थे। कुछ बसों की बॉडी इतनी जर्जर थी कि उन्हें सड़क पर चलने की अनुमति देना भी अपराध है, फिर भी वे टेक्निकली फिट घोषित थीं।

वो 6 रास्ते… जिनसे सैट होता है फिटनेस का खेल

  1. सिर्फ कागजी खानापूर्ति: जांच की प्रक्रिया कई बार केवल कैमरों के सामने से वाहन गुजारने तक सीमित रह जाती है। वास्तविक तकनीकी बारीकियों की जांच के बजाय कागजों का मिलान प्राथमिकता बन गया है।
  2. पाट्र्स की अदला-बदली : बस ऑपरेटरों ने एक शातिर तरीका निकाला है। फिटनेस टेस्ट के समय बस में नए टायर और अच्छी मशीनें लगाई जाती हैं। सर्टिफिकेट मिलते ही उन्हें उतारकर फिर से पुराना कबाड़ लगा दिया जाता है।
  3. भ्रष्टाचार और मिलीभगत: परिवहन विभाग के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। हाल ही में रायरू फिटनेस सेंटर का मामला सामने आया था, जहां एक ही चेसिस नंबर पर कई अलग-अलग गाड़ियों को फिटनेस सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए थे।
  4. नियमित मॉनिटरिंग का शून्य होना: साल में एक बार फिटनेस लेने के बाद बस संचालक निश्चिंत हो जाते हैं। विभाग की ओर से सालभर कोई औचक निरीक्षण नहीं होता, जिससे ऑपरेटर बेखौफ रहते हैं।
  5. ओवरलोडिंग और अधिक दबाव: क्षमता से अधिक सवारियां भरने से बसों के ब्रेक और सस्पेंशन जल्दी जवाब दे जाते हैं। कमाई के चक्कर में सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर दिया जाता है।
  6. मरम्मत पर कंजूसी: टायर फटने या ब्रेक फेल होने की खबरें आम हैं, क्योंकि संचालक मुनाफा कमाने के लिए मरम्मत पर होने वाले खर्च को 'फालतू' समझते हैं। इसका सीधा खतरा यात्रियों की जान पर पड़ता है।

हादसे के बाद ही क्यों जागता है प्रशासन?

परिवहन विभाग का एक पुराना ढर्रा है—हादसा होने पर जागना। जब भी कोई बड़ी घटना होती है, तो विभाग कुछ दिनों के लिए सड़कों पर उतरता है, दर्जनों बसें जब्त होती हैं, परमिट निरस्त होते हैं, लेकिन हफ्ता-दस दिन बीतते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है।

इनका कहना है

क्षेत्रीय परिवहन विभाग समय-समय पर बसों की चेकिंग करता है। खामियां मिलने पर जुर्माना और परमिट निरस्त करने जैसी कार्रवाई की जाती है। चूंकि फिटनेस सेंटर अब निजी संस्थाओं के पास हैं, इसलिए वे किस आधार पर फिटनेस जारी कर रहे हैं, इस पर कुछ कहना मुश्किल है।
— विक्रमजीत सिंह कंग, आरटीओ ग्वालियर

Updated on:
21 May 2026, 5:48 PM IST
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