एक समय था जब गर्मी की छुट्टियां बच्चों के लिए सबसे खास दिनों में गिनी जाती थीं। छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे घरों से निकलकर मोहल्लों की गलियों में खेलकूद में जुट जाते थे। कहीं गली क्रिकेट चलता था तो कहीं हाइड एंड सीक, लुका-छिपी, चोर-सिपाही और सांप-सीढ़ी जैसे पारंपरिक खेलों की धूम रहती थी। सुबह से शाम तक बच्चों की आवाजों से पूरा मोहल्ला गुलजार रहता था। मोबाइल और इंटरनेट से दूर उस दौर में दोस्ती, मस्ती और साथ खेलना ही छुट्टियों की असली खुशी हुआ करती थी। आज भी लोग उन दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं।
बर्फ की कुल्फी, खट्टी-मीठी टॉफियां और गली क्रिकेट से सजती थीं बचपन की यादें
ग्वालियर। एक दौर ऐसा था जब गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया पूरी तरह बदल जाती थी। सुबह होते ही मोहल्लों की गलियां बच्चों की आवाजों से गूंजने लगती थीं। कहीं गली क्रिकेट चल रहा होता था तो कहीं हाइड एंड सीक, लुका-छिपी, चोर-सिपाही और सांप-सीढ़ी जैसे खेलों की धूम रहती थी। दोपहर की तेज गर्मी में बर्फ वाली कुल्फी की घंटी सुनते ही बच्चे घरों से बाहर दौड़ पड़ते थे। मोहल्ले की छोटी दुकानों से खरीदी गई खट्टी-मीठी टॉफियां और चूरन भी बच्चों की छुट्टियों का खास हिस्सा हुआ करती थीं।
बीते 20 वर्षों में गर्मी की छुट्टियों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब बच्चों का ज्यादातर समय मोबाइल, वीडियो गेम और ऑनलाइन एक्टिविटीज में गुजरता है। हालांकि पुरानी छुट्टियों की सादगी, अपनापन और परिवार के साथ बिताए गए पल आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं।
ढोली बुआ का पुल निवासी शशि केशरवानी बताती हैं कि पहले छुट्टियों का मतलब ही नानी के घर जाना होता था। लगभग हर परिवार में बच्चों को एक महीने के लिए नानी या मामा के घर भेजा जाता था। वहां दिनभर मस्ती और खेलकूद चलता था। शाम होते ही सभी बच्चे छत पर इकट्ठा होकर अंताक्षरी खेलते थे और रात में नानी की कहानियां सुनते-सुनते सो जाते थे।
वे कहती हैं कि दोपहर में कुल्फी वाले की घंटी सुनते ही बच्चे खुशी से दौड़ पड़ते थे। कुल्फी का वह स्वाद आज की महंगी आइसक्रीम में भी नहीं मिलता। रात में छत पर बिस्तर लगाकर पूरा परिवार साथ सोता था। अब नई पीढ़ी के बच्चे छुट्टियों में भी मोबाइल और टीवी तक सीमित हो गए हैं।
पूजा साहू बताती हैं कि उनके बचपन में छुट्टियों का हर दिन खास होता था। मोहल्ले के सभी बच्चे मिलकर हाइड एंड सीक, लूडो, चेस और अन्य पारंपरिक खेल खेलते थे। उस समय मोबाइल फोन नहीं थे, इसलिए परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने का अलग ही आनंद था।
वे कहती हैं कि छुट्टियों में अखबारों के साथ आने वाली बच्चों की मैग्जीन पढ़ने का भी काफी क्रेज रहता था। माता-पिता बच्चों को जू, पार्क और घूमने वाली जगहों पर लेकर जाते थे। पूजा को खाना बनाने और आर्ट एंड क्राफ्ट का शौक था, इसलिए वे अपनी मां के साथ समय बिताते हुए नई चीजें सीखती थीं।
विवेक कुमार सोनी बताते हैं कि 30 साल पहले छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे खेलों और घूमने की योजनाएं बनाने लगते थे। सबसे ज्यादा उत्साह मामा के घर जाने का होता था। वहां सभी कजन मिलकर लुका-छिपी, चोर-सिपाही, सोलह पर्ची और सांप-सीढ़ी जैसे खेल खेलते थे।
वे कहते हैं कि आज बच्चों की छुट्टियां बदल गई हैं। अब बच्चे या तो कोचिंग और पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं या फिर मोबाइल पर समय बिताते हैं। पारंपरिक खेल और परिवार के साथ बिताए जाने वाले पल धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। बावजूद इसके, पुरानी गर्मी की छुट्टियों की यादें आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं।