हाईकोर्ट की एकल पीठ ने खाद्य सुरक्षा से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दुकानदार को कोई राहत देने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने खाद्य सुरक्षा से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दुकानदार को कोई राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटिया गुणवत्ता का दूध और दही मानव उपभोग के लिए बेचना गंभीर उल्लंघन है और इस पर लगाया गया जुर्माना पूरी तरह उचित है।
मुरार निवासी गिर्राज पाल ने हाईकोर्ट में सेकेंड अपील दायर की थी। खाद्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा निरीक्षण के दौरान अपीलकर्ताओं की फर्म से 30 लीटर खुला दूध प्लास्टिक के कंटेनर में और 5 किलो दही एल्यूमिनियम ट्रे में डीप फ्रीजर में रखा पाया गया था। दोनों खाद्य पदार्थ बिक्री के लिए रखे गए थे। संदेह होने पर नमूने लिए गए, जिन्हें जांच के लिए खाद्य विश्लेषक (फूड एनालिस्ट) के पास भेजा गया। जांच रिपोर्ट में दूध और दही दोनों को मानक से घटिया (सब-स्टैंडर्ड) पाया गया। इसके बाद अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी/अधिनिर्णायक अधिकारी ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 51 के तहत अपीलकर्ताओं को दोषी मानते हुए 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर प्रधान जिला न्यायाधीश ने आंशिक राहत देते हुए जुर्माने की राशि घटाकर 1 लाख रुपए कर दी। हाईकोर्ट में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट 14 दिन की समय-सीमा के बाद दी गई, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार विशेष कारणों के साथ रिपोर्ट 14 दिन बाद भी दी जा सकती है। साथ ही अपीलकर्ताओं ने न तो रेफरल लैब में दोबारा जांच की मांग की और न ही यह साबित किया कि देरी से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता प्रभावित हुई। निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।