ग्वालियर

Gwalior… विश्व अंगदान दिवस… अंधेरे में उजाले की आस, पर नेत्रदान की राह सूनी, इस साल मिले सिर्फ चार डोनर

एक तरफ शहर में कई ऐसी धुंधली आंखें हैं, जो फिर से दुनिया के रंगों को देखने की आस में अस्पतालों की वेङ्क्षटग लिस्ट में अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं। किसी बच्चे को अपनों का चेहरा देखना है, तो कोई बुजुर्ग ङ्क्षजदगी के आखिरी दिनों में उजाले...
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Aug 13, 2026
World Organ Donation Day
World Organ Donation Day

ग्वालियर. एक तरफ शहर में कई ऐसी धुंधली आंखें हैं, जो फिर से दुनिया के रंगों को देखने की आस में अस्पतालों की वेङ्क्षटग लिस्ट में अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं। किसी बच्चे को अपनों का चेहरा देखना है, तो कोई बुजुर्ग ङ्क्षजदगी के आखिरी दिनों में उजाले की राह तक रहा है। लेकिन दूसरी तरफ, ग्वालियर में नेत्रदान की पूरी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद दानदाताओं की संख्या इतनी दयनीय है कि जरूरतमंदों तक रोशनी पहुंचाने का यह इंतजार सालों लंबा होता जा रहा है। विश्व अंगदान दिवस पर शहर की यह कड़वी हकीकत सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता के इस दौर में भी हम किसी की ङ्क्षजदगी में रोशनी का दीया जलाने में कितने पीछे हैं।

नेत्र विशेषज्ञ डॉ. पुरेंद्र भसीन बताते हैं कि इस वर्ष अब तक शहर में केवल 4 लोगों का ही नेत्रदान हो सका है। सामान्य तौर पर भी सालभर में महज 10 से 15 नेत्रदान ही हो पाते हैं, जबकि वेङ्क्षटग लिस्ट में इससे कहीं ज्यादा मरीज रोशनी की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं। कई बार दूसरे महानगरों से कॉर्निया मंगवाने की नौबत आ जाती है। गजराराजा मेडिकल कॉलेज का आंकड़ा तो और भी निराशाजनक है। जीआरएमसी के नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद छावनिया के अनुसार, मेडिकल कॉलेज में इस साल अब तक नेत्रदान की संख्या शून्य है।

भ्रांतियां बन रहीं रोड़ा

कई लोग समझते हैं कि नेत्रदान में चेहरा विकृत हो जाता है, जो पूरी तरह गलत है। प्रक्रिया में आंख का केवल आगे का पारदर्शी हिस्सा ’कॉर्निया’ निकाला जाता है।
यह प्रक्रिया मृत्यु के 6 घंटे के भीतर पूरी की जानी अनिवार्य होती है।

संकल्प पत्र भरा… लेकिन परिजनों को नहीं बताया!

डॉ. प्रमोद छावनिया बताते हैं कि जागरूकता की कमी ही सबसे बड़ी बाधा है। कई बार लोग अपने जीवनकाल में नेत्रदान का संकल्प पत्र तो भर देते हैं, लेकिन अपनी इस अंतिम इच्छा के बारे में अपने परिवार के सदस्यों से चर्चा नहीं करते। मृत्यु के बाद जब दुख का क्षण आता है, तो परिजनों को इस संकल्प की जानकारी ही नहीं होती या फिर वे भावनात्मक आवेग में आकर नेत्रदान के लिए डॉक्टरों को अनुमति नहीं दे पाते।

Updated on:
13 Aug 2026 05:40 pm
Published on:
13 Aug 2026 05:39 pm