हनुमानगढ़

राजस्थान में यहां बिना झंडे चुनाव लड़ा, कोई शामिल नहीं हुआ फिर भी हुई जीत और इन्होनें जज की कुर्सी छोड़ जीती संभाग की सीट

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हनुमानगढ़/संगरिया ।

चुनावों में आज झंडे-बैनर व प्रचार सामग्री की भरमार के साथ चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। इसके विपरीत बिना झंडे के भी चुनाव लड़ा गया और परिणाम आने पर झंडे नजर आए। वहीं, जलसे में कोई नहीं पहुंचा लेकिन भारी मतों से जीत भी हासिल हुई।

उधर, जज की कुर्सी छोड़ बीकानेर संभाग में एक सीट पर जीत हासिल हुई। जी हां, हम बात कर रहे हैं सन् 1962 के विधानसभा चुनावों की। माकपा के कद्दावर नेता व खेती बचाओ किसान बचाओ आंदोलन के संयोजक ओम जांगू उस वक्त का संस्मरण याद करते हुए बताते हैं कि संगरिया सन 1962 के राजस्थान विधानसभा चुनावों के दौरान हनुमानगढ़ विधानसभा के अन्तर्गत आता था।

कामरेड शोपतसिंह मक्कासर पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े। चुनाव पूर्व क्षेत्र के प्रमुख व्यक्तियों की बैठक हुई। जिसमें कांग्रेस विरोधी जाट कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लडऩे के पक्षधर नहीं थे। युवाओं के विरोध के कारण यह तय हुआ कि चुनाव चिह्न कम्युनिस्ट पार्टी का होगा लेकिन लाल झंडा नहीं लगाया जाएगा। पूरा चुनाव बिना झंडे लड़ा गया।

शोपतसिंह फुर्सत के क्षणों में चुनावी संवाद करते हुए बताते थे चुनाव परिणाम आने के बाद ही सड़कों पर जुलूस में लाल झंडे नजर आये थे। हालांकि 1957 में वे निर्दलीय चुनाव भी लड़े थे।

ऊंट-घोड़ों संग ट्रेक्टर पर प्रचार -

1962 के चुनाव में ऊंट-घोड़ों के साथ ट्रेक्टर भी चुनाव प्रचार में नजर आने लगे थे। शोपत सिंह, हेतराम बेनीवाल अपने साथ उस समय की मशहूर 'जग्गु ते फग्गू' की नाट्य टोली के साथ गांव ढाबां में शाम के समय जलसा करने गये। हेतराम ट्रेक्टर चलाकर पूरे गांव में जलसे का अनाउंसमेंट करके खुद गए थे। जलसे में कोई नहीं, पर जीते - गांव ढाबां की गुवाड़ में दरियां बिछाकर जलसा शुरू किया। नाट्य टीम जग्गु ते फग्गू ने 'टेक्स दा बट चढु तां जनता नुं पता लग्गू' प्रस्तुत किया।

शोपतसिंह ताउम्र इस जलसे को याद करते और सबको बताते कि इस जलसे में गांव का एक भी व्यक्ति जलसा सुनने नहीं आया। फिर भी उन्होंने जलसा वैसे ही किया जैसे गुवाड़ जनता से भरी है। हेतराम बेनीवाल व शोपतसिंह ने एक-एक घंटे का जोशीला भाषण दिया। गांव से एक भी व्यक्ति नहीं आने के बावजूद 70 फीसदी से अधिक लोगों ने उन्हें वोट दिया। उन्होंने तत्कालीन मंत्री रामचन्द्र चौधरी को 16 हजार वोटों से हराया।


जज की कुर्सी छोड़ संभाग की सीट जीती

वहीं, पूर्व सैनिक डीसीसी के पूर्व उपाध्यक्ष चंद्रपाल भोबिया बताते हैं कि अन्य पार्टियों की लहर के बावजूद सन् 1977 में गांव दीनगढ़ निवासी रामचंद्र चौधरी हनुमानगढ़ विधानसभा से बीकानेर संभाग में एकमात्र सीट पर कामरेड शोपतसिंह को हराकर भारी मतों से विजयी हुए थे। वे जज की कुर्सी छोड़कर राजनीति में आए थे। मोहनलाल सुखाडिय़ा के शासन काल में चौधरी राजस्व मंत्री रहे। सीलिंग तोड़ते हुए 62 बीघा का मालिकाना हक किसानों को दिलाने, नहरों की सुचारु व्यवस्था सहित चकबंदी कराने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव चिह्न दांती हथौड़ा व कांग्रेस का दो बैलों की जोड़ी था।

Published on:
21 Sept 2018 01:00 am
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