मां के अक्सर बीमार रहने व पिता को अस्थमा होने के बाद डॉ. महेश भारद्वाज ने डॉक्टर बनने का निश्चय किया।
हाथरस। जब इरादे नेक हों तो मंजिल दूर नहीं होती। कुछ ऐसा ही हर्दपुर निवासी डॉ. महेश भारद्वाज के साथ हुआ। मां की हालत खराब और पिता को अस्थमा की बीमारी होने पर मन खिन्न हो गया और इन बीमारियों को जड़ से समाप्त करने के लिए डॉक्टर बनने की ठान ली। फिर क्या था, मेहनत शुरू की और बीएएमएस करने के बाद जन सेवा में जुट गये।
डॉ. महेश भारद्वाज का जन्म गांव हर्दपुर निवासी ल़क्ष्मीनारायण के परिवार में हुआ। बचपन से विद्यालय जाने की उम्र हुई तो पिता ने गांव के निकट तोछीगढ़ में प्रथम कक्षा में प्रवेश करा दिया और कक्षा छह तक तोछीगढ प्राथमिक विद्यालय में पढाई की। कक्षा सात से हीरालाल बारहसैनी इंटर कॉलेज अलीगढ में शिक्षा प्राप्त की। मगर इस दौरान पिता को अस्थमा हो गया और माता जी भी बीमार रहने लगी। पिता की बीमारी को देखकर मन में इस बीमारी से लड़ने की इच्छा जागृत। फिर उन्होंने मन लगाकर पढाई करना शुरू किया और इंटर करने के बाद खुर्जा से बीएएमएस की डिग्री हासिल करने चले गये। लेकिन शारीरिक परेशानी होने के कारण खुर्जा से जल्द ही घर वापस आ गये। स्वास्थ्य लाभ पाने के बाद डॉ0 भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी मुजफ्फर नगर बिहार गये जहां आयुर्वेद से अस्थमा, तथा अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों का उपचार करने हेतु बीएएमएस की डिग्री हासिल की और गांव आकर सेवा में जुट गए। उसके बाद हाथरस में रहकर मजलूमों की सेवा की।
सासनी में कोतवाली चौराहे पर सुशीला देवी नर्सिंग होम में अपनी सेवा दी। मगर कुछ समय बाद नर्सिंग होम बंद हो जाने के कारण वे वापस गांव चले गये और अब वहां बीमार लोगों का उपचार कर रहे हैं। डॉ. भारद्वाज ने बताया कि स्वयं शारीरिक परेशानी के चलते वह बाहर जाकर उपचार नहीं कर सकते। स्वयं के घर ही डिस्पेंसरी खोलकर वे मरीजों का उपचार कर रहे हैं। उनके पास आस-पास के गांव के अलावा खैर, अलीगढ, कासगंज, आदि दूर दराज से लोग उपचार के लिए आते हैं। डॉ. भारद्वाज गरीब मजलूमों का उपचार अधिकतर निःशुल्क करते हैं। डॉ. भारद्वाज के बड़े भाई भरत भारद्वाज मुम्बई में फिल्म डायरेक्टर थे जिनका निधन करीब तीन वर्ष पूर्व हो गया। अब उनके छोटे भाई जगदीश भारद्वाज फिल्म डायरेक्टर हैं। डॉ. भारद्वाज अपने पुत्र शिवम को भी चिकित्सा क्षेत्र से जोड़कर जन सेवा में लगाने हेतु प्रयासरत हैं जिससे जन सेवा की यह परंपरा बनी रहे।