स्वास्थ्य

कूलर के आगे मैं लेटूंगी की जिद में दे दी जान! मनोचिकित्सक से जानें खतरे के संकेत और क्यों बढ़ रहे हैं सुसाइड के मामले

Child Mental Health: भोपाल में एक छात्रा ने भाई से कूलर के सामने सोने को लेकर हुए मामूली विवाद के बाद अपनी जान दे दी। यह घटना सिर्फ एक सुसाइड नहीं, बल्कि हमारे समाज के लिए चेतावनी है कि आज के बच्चे मानसिक रूप से कितने कमजोर हो रहे हैं और माता-पिता को किन संकेतों को पहचानने की जरूरत है।

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Apr 29, 2026
Child Mental Health (Image- gemini)

Child Mental Health: अक्सर बच्चों के सुसाइड की खबरें पढ़कर हम कह देते हैं कि आजकल के बच्चों में सहनशक्ति ही नहीं है या जरा सी बात पर इतना बड़ा कदम उठा लिया! लेकिन भोपाल की घटना को सिर्फ एक कूलर के विवाद तक सीमित रखना गलत होगा। सच तो यह है कि वह विवाद सिर्फ एक ट्रिगर था। असली तूफान तो उस मासूम के मन के अंदर काफी समय से चल रहा होगा। सवाल यह है कि क्या हम अपने बच्चों के शारीरिक विकास को देखते-देखते उनके मन को पढ़ना भूल गए हैं? आइए डॉक्टर आदित्य सोनी (मनोचिकित्सक) से जानते हैं आपके सभी सवालों के जवाब?

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क्यों छोटी सी उम्र में आ रहे हैं ऐसे विचार?

आज के दौर में बच्चों पर पढ़ाई, सोशल मीडिया पर परफेक्ट दिखने और दूसरों से आगे निकलने का भारी दबाव है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बच्चे दिन भर मोबाइल पर सैकड़ों लोगों से बात करते हैं, लेकिन घर में अपनी बात कहने के लिए कोई कंधा नहीं मिलता। आज की इंस्टेंट जनरेशन को हर चीज तुरंत चाहिए। जब छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं होती, तो वे उस हार को बर्दाश्त नहीं कर पाते। अक्सर माता-पिता काम में इतने व्यस्त होते हैं कि वे बच्चों की चुप्पी को शांति समझ लेते हैं, जबकि वह उदासी हो सकती है।

हमारे बच्चे सुरक्षित हैं?

सुरक्षा का मतलब सिर्फ घर की चारदीवारी नहीं है। असली सुरक्षा मानसिक सुरक्षा है। अगर आपका बच्चा अपने ही घर में अपनी भावनाएं व्यक्त करने से डर रहा है या उसे लगता है कि उसकी बात कोई नहीं समझेगा, तो वह सुरक्षित नहीं है। भोपाल जैसी घटनाएं बताती हैं कि बच्चों के मन में एक गहरा खालीपन घर कर रहा है।

कैसे पहचानें कि बच्चा मानसिक रूप से परेशान है?

  • हंसमुख बच्चा अगर अचानक शांत हो जाए या चिड़चिड़ा हो जाए।
  • नींद और भूख कम हो गई है।
  • खुद को कमरे में बंद कर लेना और परिवार के साथ बैठने से कतराना।
  • मैं किसी काम का नहीं हूं या सब मेरी वजह से परेशान हैं जैसी बातें करना खतरे की घंटी हैं।

हम कहां गलती कर रहे हैं?

हमें समझना होगा कि कूलर के सामने सोने का अधिकार मांगना एक जिद हो सकती है, लेकिन उसके लिए जान दे देना एक बीमारी या गहरी चोट का संकेत है। हम बच्चों को महंगे स्कूल में तो भेज रहे हैं, पर क्या हम उन्हें ना सुनना सिखा रहे हैं? क्या हम उन्हें यह बता पा रहे हैं कि एक साल फेल होना या एक रात कूलर न मिलना जिंदगी खत्म करने से बड़ा नहीं है?

माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जब बच्चा बात करे, तो उसे बीच में टोककर लेक्चर न दें, उसे बस बोलने दें। बच्चों को यह यकीन होना चाहिए कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, उनके मम्मी-पापा उनकी बात समझेंगे। अगर बच्चा गुमसुम है, तो झिझकें नहीं। किसी अच्छे काउंसलर या डॉक्टर से बात करना शर्म की बात नहीं, समझदारी है।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।

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