World Cancer Day 2026: कैंसर की जांच के लिए अब शरीर के किसी हिस्से को काटने या सुई चुभाने की जरूरत कम होती जा रही है। 'लिक्विड बायोप्सी' वह तकनीक है जो न केवल कैंसर का पता लगाती है, बल्कि भविष्य के खतरे का भी अनुमान लगा लेती है।
World Cancer Day 2026: कैंसर जितना दर्दनाक है, उससे कहीं ज्यादा दर्दनाक अक्सर उसका इलाज और जांच की प्रक्रिया होती है। अब इस जानलेवा बीमारी से हर कोई छुटकारा पाना चाहता है, जिसके लिए विज्ञान जगत में नए-नए परीक्षण होते रहते हैं। इनमें से कई परीक्षण सफल भी होते हैं, जो कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनते हैं।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जांच के लिए अब तक 'टिश्यू बायोप्सी' का सहारा लिया जाता था, जिसमें शरीर के प्रभावित हिस्से से मांस का टुकड़ा निकाला जाता है। बायोप्सी का नाम सुनते ही मरीज दर्द और सर्जरी के डर से सिहर जाते हैं। लेकिन चिकित्सा विज्ञान की नई खोज 'लिक्विड बायोप्सी' ने इस डर को खत्म कर दिया है। यह तकनीक न केवल शुरुआती स्टेज में कैंसर को पकड़ती है, बल्कि यह भी बताती है कि मरीज पर चल रहा इलाज कितना असर कर रहा है। आइये जानते हैं कि यह क्या होती है और कैसे फायदेमंद है।
जब शरीर में कैंसर होता है, तो गांठ (ट्यूमर) की कुछ मृत कोशिकाएं (डेड सेल्स) खून में मिल जाती हैं। लिक्विड बायोप्सी के जरिए खून में से इन्हीं सर्कुलेटिंग ट्यूमर और कैंसर कोशिकाओं की पहचान की जाती है। आसान भाषा में कहें तो, यह खून की एक सामान्य जांच की तरह है जो शरीर के अंदर छिपे कैंसर का जेनेटिक कोड डिकोड कर देती है।
पारंपरिक बायोप्सी में सर्जरी या लंबी सुई का उपयोग होता है, जिसमें संक्रमण का खतरा और दर्द बना रहता है। इसके विपरीत लिक्विड बायोप्सी के कई फायदे हैं।
यह तकनीक उन मरीजों के लिए रामबाण है जिनका ट्यूमर शरीर के ऐसे हिस्सों में है जहाँ सर्जरी करना मुश्किल या जोखिम भरा है। इसके अलावा यह कैंसर के दोबारा लौटने (Relapse) की जानकारी भी बहुत पहले दे देती है। वर्तमान में लिक्विड बायोप्सी की कीमत पारंपरिक टेस्ट से थोड़ी ज्यादा हो सकती है। भारत में इसकी शुरुआत लगभग 20,000 से 50,000 रुपये के बीच होती है। हालांकि, जैसे-जैसे इसका चलन बढ़ रहा है और तकनीक विकसित हो रही है, आने वाले समय में इसकी कीमतों में बड़ी गिरावट आने की उम्मीद है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह किसी क्वालिफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। इसलिए पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से न आजमाएं, बल्कि इस बारे में विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह जरूर लें।