राजस्थान के चूरू जिले के सुजानगढ़ निवासी और वर्तमान में कर्नाटक के हुब्बल्ली में रह रहे बालकृष्ण सराफ अग्रवाल ने परदेश में न केवल व्यापार के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, बल्कि धर्म, सेवा और संस्कार के माध्यम से समाज में एक प्रेरक उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। उद्योग और अध्यात्म का ऐसा संतुलन बहुत कम देखने को मिलता है, जिसे बालकृष्ण सराफ ने अपने जीवन में साकार किया है।
उद्यमिता की मजबूत यात्रा
बालकृष्ण सराफ के पिता प्रयाग नारायण सराफ वर्ष 1960 में कोलकाता आए थे, जहां उन्होंने कांच की चूडिय़ों का व्यापार शुरू किया। वहीं बालकृष्ण सराफ की शिक्षा भी कोलकाता में हुई और उन्होंने बीकॉम तक अध्ययन किया। वर्ष 1995 में वे हुब्बल्ली आए और यहां कावेरी इंडस्ट्रियल के नाम से नट-बोल्ट की दुकान शुरू की। आज यह प्रतिष्ठान मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग दोनों के माध्यम से पूरे उत्तर कर्नाटक में सप्लाई करता है। इसके साथ ही कावेरी सरफेस इंजीनियरिंग के अंतर्गत नट-बोल्ट पर कलर और फाउंडेशन बोल्ट का कार्य भी किया जा रहा है।
राम नाम लेखन से अयोध्या तक आस्था की यात्रा
बालकृष्ण सराफ की पहचान केवल उद्योगपति के रूप में ही नहीं, बल्कि एक समर्पित धार्मिक कार्यकर्ता के रूप में भी है। वे पिछले 26 वर्षों से अखिल भारतीय मानस प्रचार समिति हुब्बल्ली से जुड़े हुए हैं। समिति के तहत हर रविवार को रामचरितमानस के दोहों का पठन, भजन, आरती, हनुमान चालीसा और गीता श्लोकों का वाचन किया जाता है।
तीन हजार से अधिक राम नाम पुस्तिकाएं वितरित
विशेष रूप से भगवन्नाम महात्म्य की 28,860 राम नाम जप वाली पुस्तिका उनका एक अभिनव और प्रेरक प्रयास है। यह पुस्तिका वे नि:शुल्क वितरित करते हैं। पिछले आठ वर्षों में अब तक 3,000 से अधिक राम नाम लेखन पुस्तिकाएं वितरित की जा चुकी हैं। इन पुस्तिकाओं में एक विशेष आयताकार आकार में राम नाम लिखा जाता है। पुस्तिका पूर्ण होने पर इसे अयोध्या भेजा जाता है, गंगा में प्रवाहित किया जा सकता है या किसी नए मंदिर की नींव में स्थापित किया जाता है। यह पहल लोगों को दैनिक जीवन में राम नाम से जोडऩे का सशक्त माध्यम बन गई है।
गल्लेनुमा गाय: छोटी बचत, बड़ा संकल्प
गौसेवा के क्षेत्र में भी बालकृष्ण सराफ का योगदान उल्लेखनीय है। पिछले आठ वर्षों में वे 2,000 से अधिक गल्लेनुमा प्लास्टिक गाय की प्रतिमाएं वितरित कर चुके हैं। इन गाय की आकृतियों में गल्ला बना होता है, जिसमें लोग प्रतिदिन या जन्मदिन, पर्व एवं अन्य शुभ अवसरों पर छोटी-छोटी राशि डालते हैं। कुछ समय बाद यह संपूर्ण राशि नजदीकी गौशाला में दान कर दी जाती है। खास बात यह है कि उन्होंने अपनी दुकान में भी ऐसी गाय की प्रतिमा रखी है, जहां देर से आने वाले कर्मचारियों से 10 रुपए का प्रतीकात्मक जुर्माना इसी गल्ले में डलवाया जाता है। यह राशि भी गौशाला को समर्पित की जाती है। यह पहल अनुशासन के साथ सेवा का सुंदर उदाहरण बन गई है।
सेवा, शिक्षा और संगठन में सक्रिय भूमिका
बालकृष्ण सराफ रोटरी क्लब ऑफ हुब्बल्ली मिडटाउन के अध्यक्ष रह चुके हैं और उनके कार्यकाल में कई नि:शुल्क सेवा शिविर आयोजित हुए। वे नारायण गौशाला से एक दशक से जुड़े हैं तथा गोपाल गौसेवा समिति हुब्बल्ली के माध्यम से गोपाष्टमी आयोजन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसके साथ ही वे सनातन सेवा संगठन चैरिटेबल ट्रस्ट की एडवाइजरी कमेटी के सदस्य, अग्रवाल समाज हुब्बल्ली के पूर्व संयुक्त सचिव और अग्रसेन जयंती महोत्सव के चेयरमैन भी रह चुके हैं। पिछले एक वर्ष से वे बाल सत्संग सुधा के फाउंडेशन मेंबर हैं, जहां बच्चों को संस्कारों की शिक्षा दी जाती है। साथ ही रोटरी सरस्वती विद्यालय हुब्बल्ली में निदेशक के रूप में भी सेवाएं दे रहे हैं। विभिन्न धार्मिक आयोजनों में वे गीताप्रेस की पुस्तकों की स्टॉल लगाते हैं, जिनकी पूरी बिक्री राशि गौशाला को दान कर दी जाती है।