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गुरु जम्भेश्वर भगवान की महिमा का हुआ गुणगान, पाहल ग्रहण कर विश्नोई समाज ने लिया सात्विक जीवन का संकल्प

पाहल एवं होली मिलन समारोहदक्षिण भारतीय विश्नोई समाज हुब्बल्ली के तत्वावधान में मंगलवार को आयोजित पाहल एवं होली मिलन समारोह श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक एकता के वातावरण में संपन्न हुआ। स्वामी नमकीन फैक्ट्री के पास बुदरसिंघी गांव में आयोजित इस कार्यक्रम में हुब्बल्ली तथा आसपास के तालुकों व जिलों से समाजबंधु परिवार सहित बड़ी संख्या […]

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हवन-यज्ञ के पश्चात श्रद्धापूर्वक पाहल ग्रहण करते विश्नोई समाज के श्रद्धालु।

हवन-यज्ञ के पश्चात श्रद्धापूर्वक पाहल ग्रहण करते विश्नोई समाज के श्रद्धालु।

पाहल एवं होली मिलन समारोह
दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज हुब्बल्ली के तत्वावधान में मंगलवार को आयोजित पाहल एवं होली मिलन समारोह श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक एकता के वातावरण में संपन्न हुआ। स्वामी नमकीन फैक्ट्री के पास बुदरसिंघी गांव में आयोजित इस कार्यक्रम में हुब्बल्ली तथा आसपास के तालुकों व जिलों से समाजबंधु परिवार सहित बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह समारोह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज की एकजुटता, संस्कार और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प को भी सुदृढ़ करने वाला अवसर साबित हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह विधिवत हवन-यज्ञ से हुई। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अग्नि में आहुतियां अर्पित की गईं और समस्त समाज की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना की गई। इसके पश्चात समाजबंधुओं ने श्रद्धा के साथ पाहल ग्रहण किया।

पर्यावरण संरक्षण से जोडऩे पर चर्चा
समारोह के दौरान गुरु जाम्भेश्वर भगवान की महिमा का गुणगान किया गया और उनके द्वारा स्थापित 29 नियमों के पालन का संकल्प दोहराया गया। हवन एवं पाहल के उपरांत समाज की बैठक आयोजित हुई, जिसमें सामाजिक एकता, संस्कारों की परंपरा और युवा पीढ़ी को धर्म एवं पर्यावरण संरक्षण से जोडऩे पर चर्चा की गई। बैठक के पश्चात सभी ने महाप्रसादी ग्रहण की।

पाहल का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व
दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज हुब्बल्ली के बीरबल विश्नोई ने बताया कि विश्नोई समाज में पाहल (पाहल जल) को अत्यंत पवित्र धार्मिक परंपरा माना जाता है। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गुरु जम्भेश्वर भगवान द्वारा प्रतिपादित 29 नियमों की दीक्षा का प्रतीक है। पाहल ग्रहण कर व्यक्ति सात्विक, संयमित और नैतिक जीवन जीने का संकल्प लेता है। समाज में जन्म, विवाह और अन्य प्रमुख संस्कारों के समय पाहल लेना अनिवार्य माना जाता है। इसे आत्मशुद्धि, अवगुणों के त्याग और धर्ममार्ग पर स्थिर रहने का माध्यम समझा जाता है।

जीवों के संरक्षण का प्रण
पाहल के साथ व्यक्ति नशा, मांसाहार और अन्य बुराइयों से दूर रहने की प्रतिज्ञा करता है। साथ ही हरे वृक्षों की रक्षा और जीवों के संरक्षण का प्रण भी लेता है। विश्नोई समाज की पहचान प्रकृति संरक्षण और जीवदया के सिद्धांतों से जुड़ी रही है। गुरु जम्भेश्वर भगवान ने पर्यावरण संतुलन और नैतिक जीवन के जो आदर्श स्थापित किए, वे आज भी समाज के मार्गदर्शक हैं।