भारतीय राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि देश की आत्मा, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। जिस तिरंगे के लिए लाखों लोगों ने त्याग और बलिदान दिए, वही तिरंगा आज बाजार में सस्ते विकल्पों की दौड़ में अपनी पहचान खोने के खतरे से जूझ रहा है। यह […]
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि देश की आत्मा, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। जिस तिरंगे के लिए लाखों लोगों ने त्याग और बलिदान दिए, वही तिरंगा आज बाजार में सस्ते विकल्पों की दौड़ में अपनी पहचान खोने के खतरे से जूझ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक ही नहीं, आत्ममंथन की मांग भी करती है।
देश में खादी से बने राष्ट्रीय ध्वज की एकमात्र बीआईएस-प्रमाणित इकाई कर्नाटक के हुब्बल्ली स्थित बेंगेरी क्षेत्र में है। यहां बनने वाला तिरंगा केवल कपड़ा नहीं, बल्कि गांधीवादी विचारधारा, आत्मनिर्भर भारत और महिला श्रम का प्रतीक है। इस इकाई में राष्ट्रीय ध्वज निर्माण का पूरा कार्य महिलाओं के हाथों होता है, कताई, बुनाई, सिलाई, अशोक चक्र की छपाई से लेकर पैकिंग तक। खादी का तिरंगा हजारों महिलाओं और कारीगरों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। आज विडंबना यह है कि पर्यावरण के अनुकूल, हाथ से बने और सम्मानजनक निस्तारण योग्य खादी झंडों की बिक्री लगातार घट रही है, जबकि मशीन से बने पॉलिएस्टर झंडे बाजार पर हावी होते जा रहे हैं। पॉलिएस्टर झंडे भले ही सस्ते हों, लेकिन वे न तो टिकाऊ मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही पर्यावरणीय जिम्मेदारी का। स्वतंत्रता और गणतंत्र जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर ऐसे विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमने तिरंगे की गरिमा को केवल एक वस्तु तक सीमित कर दिया है?
महात्मा गांधी ने खादी को स्वावलंबन और स्वाभिमान का प्रतीक माना था। आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की बात करता है, तब खादी के तिरंगे की उपेक्षा इस विचार के विपरीत जाती प्रतीत होती है। यह केवल एक इकाई या एक उद्योग का संकट नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय चेतना की परीक्षा है। गणतंत्र दिवस जैसे पावन अवसर पर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्या हम देश की शान को सस्ते विकल्पों के तराजू पर तौलेंगे, या उसके सम्मान, परंपरा और मूल्यों को प्राथमिकता देंगे? समय आ गया है कि नीति-निर्माता, संस्थान और नागरिक मिलकर खादी के तिरंगे को उसका उचित सम्मान लौटाएं। क्योंकि तिरंगा जब खादी का होता है, तब वह केवल लहराता नहीं, देश की आत्मा बोलता है।