क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़
श्री क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ (कर्नाटक) की ओर से हर साल दीपावली स्नेह मिलन समारोह का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही अन्य पर्व व त्योहार समाज के लोग उत्साह के साथ मनाते हैं। अब समाज के भवन बनाने के लिए भूखण्ड लेने पर विचार किया जा रहा है। श्री क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ की स्थापना वर्ष 2009 में की गई। घांची समाज के सुखराज राठौड़ सिवाना एवं मांगीलाल राठौड़ सिवाना वर्ष 1982 में हुब्बल्ली आए। इसके बाद से लगातार घांची समाज के लोगों का हुब्बल्ली आने का क्रम बना हुआ है। घांची समाज के हुब्बल्ली में वर्तमान में करीब 65 परिवार निवास कर रहे हैं। वहीं धारवाड़ में पांच परिवार है। समाज के अधिकांश लोग राजस्थान के बालोतरा, जालोर, पाली एवं सांचौर जिले के रहने वाले हैं। अधिकांश लोग इलेक्ट्रिकल्स, कपड़ा, रेडिमेड गारमेन्ट, इमिटेशन ज्वैलरी, प्लास्टिक समेत अन्य बिजनेस में हैं।
नई कार्यकारिणी
क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ की नई कार्यकारिणी का गठन तीन वर्ष के लिए किया गया है। वेलाराम बोराणा धानसा अध्यक्ष, ओमप्रकाश भाटी समदड़ी उपाध्यक्ष, खेताराम परमार बाली सचिव, वालाराम चौहान बालोतरा कोषाध्यक्ष, देवाराम देवड़ा भंवरानी संयुक्त सचिव, हनुमानचन्द राठौड़ सिवाना उप सचिव, जगदीश परमार चितलवाना आयोजन सचिव, रामेश्वर भाटी बालोतरा एवं अरविन्द कुमार बोराणा जालोर प्रचार मंत्री तथा नैनाराम सोलंकी सामूजा एवं पारसमल गहलोत मांडवला सलाहकार बनाए गए।
समाज को उंचाइयों पर ले जाने के लिए काम
क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ के अध्यक्ष वेलाराम बोराणा धानसा ने बताया कि समाज के सभी लोगों के साथ मिलकर समाज को और अधिक उंचाइयों पर ले जाने के लिए काम किया जाएगा। समाज का भवन बनाने के लिए भी विचार किया जा रहा है। इसके लिए जल्द ही समाज की मीटिंग बुलाकर सभी की राय ली जाएगी।
अब समाज बिजनेस में आगे बढ़ रहा
क्षत्रिय घांची समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ के अध्यक्ष वेलाराम बोराणा धानसा ने बताया कि घांची समाज का नाम घाणी से बना है। घांची का अर्थ यही है कि घा यानी घाणी चलाने वाले। ची यानी राजा जयसिंह की चिन्ता दूर करने से घाणी का घा चिन्ता का ची मिलकर घांची कहलाए। राजस्थान में समस्त घांची समाज की ओर से राजस्थान सरकार से घाणी उद्योग बोर्ड के गठन की मांग की हैं। घाणी उद्योग बोर्ड की स्थापना हो जाने के बाद समाज का उत्थान होगा। समाज अब शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहा है। उच्च शिक्षित बच्चे व्यवसाय को भी और अधिक उंचाइयों पर ले जा रहे हैं। घांची समाज के लोग 890 साल पहले गुजरात से मारवाड़ में आकर बसे थे। कभी घांची समाज के लोग तेल के व्यवसाय से जुड़े थे, मगर बाद में दूध, कैटरिंग समेत अन्य व्यवसाय में नाम कमाया। राजस्थान के जोधपुर, सिरोही, पाली, जालोर, सांचौर, बालोतरा जिलों में घांची समाज के लोगों की तादाद अधिक है। समाज में शिक्षा की अलख भी जगाई जा रही है। घांची जाति का उदभव क्षत्रिय जाति से हुआ है इसलिए घांची समाज को क्षत्रिय घांची समाज के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है कि पाटण के राजा जयसिंह सिद्धराज सोलंकी के नवलखा बाग में रोज रात को देवलोक से परियां पुष्प चोरी करके ले जाती थी जिस पर पंडितों ने सलाह दी की देवलोक में बैंगन का पौधा अपवित्र माना जाता है इसलिए फूलों के पास में बैंगन का पौधा लगा देने से परियां पुष्प चोरी नहीं कर सकेगी। राजा ने ऐसा ही किया तो एक परी के बैंगन का पौधा टच हो जाने से वो वापस इन्द्रलोक नहीं जा सकी। उसने राजा को कहा कि तुम विविध धर्म पुण्य मेरे नाम से करो व पूनम एकादशी के उपवास करो तो मैं पाप से निवृत होकर वापस देवलोक जा सकती हूं। राजा ने ऐसा ही किया तथा परी जब वापस जाने लगी तो राजा ने भी देवलोक की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की। इस पर परी ने इन्द्र से अनुमति लेकर राजा को सपने में देवलोक की यात्रा करवाई। वहां स्वर्ग में एक विशाल शिव मंदिर रूद्रमहालय था जिसका नक्शा राजा को पंसद आ गया। उसने स्वप्न से जागकर अपने कारीगरों से इस मंदिर निर्माण का पूछा तो पता चला कि ऐसा मंदिर 24 वर्ष में बन सकता है। परन्तु ज्योतिषियों ने राजा की आयु 12 वर्ष ही शेष बताई थी। इस पर राजा ने रात व दिन दोनों समय निर्माण करके मंदिर 12 वर्ष में ही बनाने की आज्ञा दी। उस समय बिजली नहीं थी। तब मशालों से रात में काम होता था व मशालें तेल से जलती थी तथा तेली रात-दिन काम करके दुखी थे। तेली भाग न जावें इसकी पहरेदारी के लिये विभिन्न गोत्रों के 173 सरदारों की टीम लगी थी परन्तु तेलियों ने चालाकी से इनको दावत में बुलाकर नशा दे दिया जिससे ये रात को सो गए व तेली भाग निकले। इस पर राजा इन पहरेदारों पर कुपित हुआ तथा इनको तेलियों के स्थान पर काम करने की आज्ञा दे दी। इन सरदारों ने तेली का काम करके राजा से इनाम लेने के लालच में तेली के कपडे पहन कर राजा की सभा में पहुचें तो अन्य सरदारों ने इनका उपहास किया जिससे ये नाराज होकर राजा जयसिंह का राज्य छोड कर आबू क्षेत्र मे आ गए तथा घांची कहलाए।