हुबली

स्कूल की चारदीवारी से बाहर भी मिलते हैं ऐसे गुरु, जो पढ़ाते नहीं, लेकिन बच्चों के भविष्य की राह जरूर आसान करते हैं

गुरु केवल वह नहीं, जो कक्षा में किताब का पाठ पढ़ाए। जिंदगी के सफर में ऐसे लोग भी मिलते हैं, जो किसी बच्चे की आर्थिक परेशानी दूर करते हैं, परीक्षा का डर कम करते हैं या शिक्षा तक पहुंचने की राह आसान बनाते हैं। हुब्बल्ली में राजस्थान से आकर अपनी कर्मभूमि बनाने वाले प्रकाश बाफना, मुकेश हिंगड और विक्रम जैन मांडौत अलग-अलग तरीके से विद्यार्थियों की मदद कर रहे हैं।
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शिक्षा की राह आसान बनाने में जुटे राजस्थान मूल के प्रकाश बाफना, मुकेश हिंगड और विक्रम मांडौत।
शिक्षा की राह आसान बनाने में जुटे राजस्थान मूल के प्रकाश बाफना, मुकेश हिंगड और विक्रम मांडौत।

कोई जरूरतमंद विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देकर उनकी पढ़ाई जारी रखने में सहयोग कर रहा है तो कोई कार्यशालाओं के जरिए बच्चों और शिक्षकों में आत्मविश्वास बढ़ा रहा है। वहीं किसी ने बेटियों के स्कूल पहुंचने की राह आसान करने के लिए साइकिल को माध्यम बनाया है। इनके प्रयास बताते हैं कि बदलाव के लिए हमेशा बड़ी योजनाओं की जरूरत नहीं होती, संवेदनशील सोच और छोटी-सी पहल भी किसी बच्चे के भविष्य की दिशा बदल सकती है।

प्रकाश बाफना: छात्रवृत्ति से सपनों को दी उड़ान

विद्या आशीर्वाद योजना से जरूरतमंद विद्यार्थियों को सहयोग

राजस्थान के बालोतरा जिले के मोकलसर निवासी प्रकाश बाफना ने हुब्बल्ली को अपनी कर्मभूमि बनाया। उद्योग और व्यवसाय के साथ उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी तय की है। भंवरीदेवी सांवलचन्द चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में वे पिछले दो वर्षों से विद्या आशीर्वाद योजना के माध्यम से जरूरतमंद विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति उपलब्ध करा रहे हैं।

इस पहल में छात्रवृत्ति के लिए जाति या धर्म को आधार नहीं बनाया जाता। जरूरतमंद विद्यार्थी तक सहायता पहुंचे, यही प्राथमिकता है। दसवीं के बाद की पढ़ाई कर रहे ऐसे विद्यार्थियों को भी सहयोग दिया जा रहा है, जिनके सामने आर्थिक कारणों से शिक्षा बीच में छूटने का खतरा रहता है।

बाफना बताते हैं कि एक विद्यार्थी को छात्रवृत्ति दी गई थी। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उसने मेहनत जारी रखी और परीक्षा में टॉप किया। उनके लिए यह केवल एक विद्यार्थी की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की सफलता है जिसमें आर्थिक परिस्थितियां किसी बच्चे की प्रतिभा के रास्ते में बाधा न बनें।

उनका मानना है कि विद्यार्थी की पढ़ाई में किया गया सहयोग उसके पूरे भविष्य में निवेश है। छात्रवृत्ति की मदद भले कुछ समय के लिए मिले, लेकिन इससे बच्चे को अपने सपनों की ओर आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

मुकेश हिंगड: डर हटाया, हौसला बढ़ाया

कार्यशालाओं से आत्मविश्वास बढ़ाने की पहल, हर साल 250 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति

राजस्थान मूल के व्यवसायी मुकेश हिंगड पिछले करीब आठ वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। मुकेश हिंगड फाउंडेशन के चेयरमैन के रूप में वे शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग विषयों पर कार्यशालाएं आयोजित करते रहे हैं।

शिक्षकों के लिए विशेषज्ञों को बुलाकर मोटिवेशनल टॉक और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उनका मानना है कि शिक्षक केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व और भविष्य को दिशा देने वाला मार्गदर्शक है। इसी सोच के साथ शिक्षकों के लिए ‘हंसते रहो’ जैसी कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं।

विद्यार्थियों के लिए होने वाली कार्यशालाओं में परीक्षा के डर को कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। कई बार बच्चे पढ़ाई से ज्यादा असफल होने के डर से परेशान होते हैं। ऐसे में उन्हें यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि परीक्षा जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि सीखने और आगे बढ़ने का अवसर है।

मुकेश हिंगड फाउंडेशन की ओर से हर साल करीब 250 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति भी दी जा रही है। यानी एक ओर कार्यशालाओं के जरिए बच्चों के भीतर आत्मविश्वास पैदा किया जा रहा है तो दूसरी ओर छात्रवृत्ति के जरिए उनकी आर्थिक बाधाओं को कम किया जा रहा है।

मुकेश हिंगड कहते हैं, “गुरु दीपक के समान हैं, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं।” उनके लिए शिक्षा किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और आगे बढ़ने की क्षमता विकसित करने का माध्यम है।

विक्रम जैन मांडौत: साइकिल से बेटियों की राह आसान

दस साल में करीब 100 साइकिलें बांटीं, स्कूल पहुंचने की दूरी हुई कम

राजस्थान के जालोर जिले के ऐलाना निवासी व्यवसायी विक्रम जैन मांडौत ने बेटियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने का सरल लेकिन प्रभावी रास्ता चुना। पिछले करीब दस वर्षों से वे जरूरतमंद छात्राओं को साइकिलें वितरित कर रहे हैं। अब तक करीब 100 साइकिलें बांटी जा चुकी हैं।

इस पहल की शुरुआत एक दृश्य से हुई। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में उन्होंने देखा कि कई छात्राओं को स्कूल जाने के लिए बस का लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। कुछ बच्चियां लंबी दूरी पैदल तय करके विद्यालय पहुंचती थीं। दूरी और परिवहन की समस्या कई बार उनकी पढ़ाई में बाधा बन जाती थी।

उनके मन में विचार आया कि अगर इन छात्राओं के पास साइकिल हो तो वे आसानी से और समय पर स्कूल पहुंच सकती हैं। धीरे-धीरे यही सोच एक पहल में बदल गई।

इन साइकिलों का लाभ मुख्य रूप से कमजोर वर्ग की जरूरतमंद छात्राओं को मिला है। उनके लिए साइकिल केवल आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि स्कूल और सपनों के बीच की दूरी कम करने का जरिया बनी है।

विक्रम जैन मांडौत का प्रयास बताता है कि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हमेशा किताब या फीस देना ही जरूरी नहीं। कभी-कभी शिक्षा की राह में खड़ी एक छोटी-सी बाधा हटाना भी किसी बेटी के भविष्य के लिए बड़ा कदम बन जाता है।

एक साइकिल ने शायद एक बच्ची का रास्ता आसान किया हो, लेकिन उस रास्ते पर उसके सपने भी आगे बढ़े हैं।

Updated on:
09 Sept 2026 10:13 pm
Published on:
09 Sept 2026 10:10 pm