कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ के कुलपति प्रो. ए. एम. खान ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में साहित्य और समाज के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्यकार हमेशा समाज और सरकार को सकारात्मक दिशा देने का कार्य करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो समाज साहित्य का सम्मान करता है, वही आगे बढ़ता है। वे शुक्रवार को यहां कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ के हिंदी विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी विश्वशांति में समकालीन भारतीय साहित्य एवं प्रवासी साहित्य का योगदान के शुभारंभ अवसर पर बोल रहे थे।
समाज में शांति और प्रेम बना रहे
कर्नाटक विश्वविद्यालय के मानसोल्लास भवन में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सेमीनार के पहले दिन उन्होंने विश्वशांति की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि आज वैश्विक स्तर पर शांति की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में यह संकल्प ले कि वह शांति और सद्भाव के साथ जीवन जिएगा, तो समाज में प्रेम और भाईचारे का वातावरण स्वत: निर्मित होगा। उन्होंने कहा, हमें मन में ठान लेना चाहिए कि हम डटकर शांति के साथ रहेंगे। समाज में शांति और प्रेम बना रहे, यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों की उपस्थिति में कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। उद्घाटन समारोह का वातावरण साहित्यिक ऊर्जा, वैचारिक गंभीरता और सांस्कृतिक गरिमा से भर उठा।
संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला
उद्घाटनकर्ता के रूप में बेंगलूरु की प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. स्मिता बी.टी. ललिता नायक उपस्थित रहीं। बीज वक्तव्य प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. महेश दिवाकर ने प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि के रूप में कोल्हापुर, महाराष्ट्र के साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. अर्जुन चव्हाण उपस्थित रहे। समारोह में मध्य प्रदेश के साहित्यकार डॉ. राजेश श्रीवास्तव, केंद्रीय विद्यालय धारवाड़ के प्राचार्य राकेश गोयल, कर्नाटक विश्वविद्यालय सिंडिकेट एवं अकादमिक काउंसिल के सदस्य तथा अन्य गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम के निर्देशक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सीताराम के. पवार ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।
शांति और सांस्कृतिक साझेदारी का समय
अपने संबोधन में वक्ताओं ने कहा कि आज का समय वैश्विक स्तर पर संवाद, शांति और सांस्कृतिक साझेदारी का समय है। भारतीय साहित्य और प्रवासी साहित्य ने सीमाओं को पार करते हुए विश्व मानवता को जोडऩे का महत्वपूर्ण कार्य किया है। साहित्य केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का संवाहक भी है। कार्यक्रम के दौरान दीप प्रज्ज्वलन के बाद पुस्तक विमोचन भी किया गया। मंच पर उपस्थित अतिथियों ने पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए साहित्यिक परंपराओं और बौद्धिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उद्घाटन सत्र में मौजूद विद्वानों ने प्रवासी साहित्य को विश्व स्तर पर भारतीय संस्कृति की पहचान मजबूत करने वाला माध्यम बताया।
तकनीकी सत्रों में साहित्यिक विमर्श
उद्घाटन के बाद संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों की शुरुआत हुई। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. महेश दिवाकर ने की। प्रमुख वक्ताओं में प्रो. ईश्वर पवार, प्रो. रामप्रकाश तथा प्रो. तारक एस. पवार शामिल रहे। दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. ईश्वर पवार ने की। इसमें डॉ. ज्ञानचंद मर्मज्ञ, डॉ. राजेश श्रीवास्तव तथा प्रो. श्रीधर हुड्डे ने अपने विचार रखे। तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. अर्जुन चव्हाण ने की, जबकि प्रमुख वक्ताओं में प्रो. नामदेव गोंड, डॉ. धनकुमार बिराजदार तथा प्रो. सुभा रोडावर शामिल रहीं। पहले दिन के कार्यक्रम में शाम को कवि गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इसमें हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं ने प्रस्तुति दी।
सीताराम पवार का अभिनंदन समारोह आज
संगोष्ठी के दूसरे दिन 23 मई को विभिन्न अकादमिक सत्र आयोजित किए जाएंगे। समापन समारोह की अध्यक्षता प्रो. अर्जुन चव्हाण करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में कर्नाटक विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. मृत्युंजय अगाड़ी उपस्थित रहेंगे। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. ए. एम. कड़कौल, प्रो. महेश दिवाकर तथा विश्वविद्यालय के सिंडिकेट एवं अकादमिक परिषद के सदस्य भाग लेंगे। इसी अवसर पर हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सीताराम के. पवार के अभिनंदन तथा ग्रंथ लोकार्पण समारोह का भी आयोजन किया जाएगा, जिसके लिए विशेष अभिनंदन समिति गठित की गई है।