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चंद्रमौलेश्वर मंदिर: दीवारों, स्तंभों और पत्थरों पर कलात्मक नक्काशी, 900 वर्ष पुराना मंदिर पश्चिमी चालुक्य वास्तुकला की उत्कृष्ट पहचान

हुब्बल्ली के उणकल क्षेत्र में स्थित चंद्रमौलेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। लगभग 900 वर्ष पुराना यह मंदिर पश्चिमी चालुक्य वास्तुकला की उत्कृष्ट पहचान माना जाता है। पत्थरों पर उकेरी गई अद्भुत नक्काशी, चारों दिशाओं में खुलने वाली अनूठी संरचना और आध्यात्मिक वातावरण इसे कर्नाटक की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में विशेष स्थान दिलाते हैं। 11वीं-12वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे चार दिशाओं से खुला बनाया गया है, जो उस दौर की स्थापत्य शैली का अनोखा उदाहरण माना जाता है। मंदिर में स्थापित चतुर्मुख शिवलिंग श्रद्धालुओं को किसी भी दिशा से दर्शन की सुविधा प्रदान करता था। यह संरचना उस समय की स्थापत्य समझ और धार्मिक दृष्टिकोण दोनों को दर्शाती है।
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हुबली

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ASHOK SINGH RAJPUROHIT

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Updated: 20 May 2026, 8:06 PM IST

चंद्रमौलेश्वर मंदिर की प्राचीन और भव्य संरचना।

चंद्रमौलेश्वर मंदिर की प्राचीन और भव्य संरचना।

नटराज, गणेश, नरसिंह और देवी स्वरूपों की सुंदर प्रतिमाए
मंदिर की दीवारों, स्तंभों और पत्थरों पर की गई कलात्मक नक्काशी इसकी भव्यता को और बढ़ाती है। यहां शैव परंपरा के साथ-साथ वैष्णव और अन्य धार्मिक मान्यताओं की झलक भी दिखाई देती है। नटराज, गणेश, नरसिंह और देवी स्वरूपों की सुंदर प्रतिमाएं प्राचीन शिल्पकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाती हैं। यही कारण है कि यह मंदिर केवल श्रद्धालुओं के लिए नहीं, बल्कि इतिहासकारों और स्थापत्य विशेषज्ञों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। समय के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और विकास की आवश्यकता भी महसूस की गई। हाल ही में विधानसभा की याचिका समिति ने मंदिर परिसर का निरीक्षण कर इसके समग्र विकास की दिशा में चर्चा की। मंदिर और आसपास के क्षेत्र को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए लगभग 25 करोड़ रुपए की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई है। इस योजना में भूमि अधिग्रहण, आधारभूत सुविधाओं का विस्तार, पार्किंग, पर्यटक सुविधाएं और परिसर सौंदर्यीकरण जैसे कार्य प्रस्तावित हैं।

श्रद्धा और इतिहास का संगम
हालांकि विकास कार्यों के साथ स्थानीय निवासियों के पुनर्वास और संरक्षित क्षेत्र के संतुलन जैसे विषय भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ऐतिहासिक धरोहर का विकास उसकी मूल पहचान और विरासत को सुरक्षित रखते हुए किया जाना चाहिए। उणकल झील के समीप स्थित चंद्रमौलेश्वर मंदिर आज भी श्रद्धा और इतिहास का संगम बना हुआ है। यह मंदिर केवल अतीत की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि आने वाली पीढिय़ों को हमारी सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि से परिचित कराने का भी माध्यम है। यदि प्रस्तावित योजनाएं संतुलित तरीके से लागू होती हैं, तो यह धरोहर भविष्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और अधिक प्रभावशाली पहचान बना सकती है।

युगादि के दिन सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग पर
मंदिर के पुजारी पवन कुमार ने बताया कि मंदिर में एक मुख्य एकमुखी शिवलिंग के साथ ही मंदिर के पीछे स्थापित छोटा शिवलिंग चतुरमुखी स्वरूप में विराजमान है। विशेष बात यह है कि युगादि के दिन वर्ष में केवल एक बार सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग पर पड़ती हैं, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है।