मामला 12 साल से अधूरे अस्पताल का
इंदौर. 12 साल से अटके कैंसर अस्पताल का मामला स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट और शहर के वरिष्ठ डॉक्टरों के बीच चर्चा में उठने के बाद गरमा गया है। सरकारी जमीन पर बने अस्पताल को शासन द्वारा अधिगृहीत करने का सुझाव भी आया। मंत्री ने इस मामले में जांच कराकर उचित कदम उठाने की बात कही है।
अस्पताल संचालित करने वाली रमन फाउंडेशन का कहना है, सरकार के रवैये से यह हालात बने हैं, सरकार मदद करे तो एक माह में अस्पताल शुरू कर सकते हैं। कैंसर केयर ट्रस्ट को शासन ने राऊ में 10 एकड़ जमीन कैंसर अस्पताल बनाने के लिए दी गई थी। ट्रस्ट के आपसी झगड़ों में अस्पताल बंद हो गया। वर्ष 2006 में दोबारा रमन फाउंडेशन ने इसे खरीदा, लेकिन करोड़ों खर्च होने के बाद भी अस्पताल शुरू नहीं हो पाया।
यूं टूटा सस्ते इलाज का सपना
कैंसर केयर ट्रस्ट की शुरुआत 1989 उषा राजे होलकर व सतीश चंद्र मल्होत्रा ने की थी। मकसद गरीब मरीजों की पहुंच से दूर कैंसर के महंगे इलाज को उनकी हद में लाना था। डेढ़ दशक तक गतिविधियां चलती रही, जिस आधार पर दिग्विजयसिंह के शासन काल में 10 एकड़ जमीन अस्पताल बनाने के लिए मिली। 2006 में ट्रस्ट सदस्यों में विवाद व मतभेद के चलते ट्रस्ट बंद हो गया तब बैंक ऑफ बड़ौदा ने हॉस्पिटल की इमारत को नीलाम कर दिया, जिसे रमन फाउंडेशन ने खरीदा। उसके बाद भी समस्याओं का अंत नहीं हुआ।
प्राइवेट में हो रहा महंगा इलाज
शहर में एमजीएम मेडिकल कॉलेज के शासकीय कैंसर अस्पताल के अलावा निजी अस्पतालों में चोइथराम कैंसर, सीएचएल कैंसर, अरबिंदो, शैल्बी अस्पताल और इंदौर कैंसर फाउंडेशन हैं। शासकीय अस्पताल में आज भी वर्षों पुरानी कोबाल्ट मशीन से ही रेडिएशन दिया जाता है। इन अस्पतालों में संसाधनों की भारी कमी है। शहर में निजी अस्पताल में इलाज के लिए औसतन एक से डेढ़ लाख रुपए का खर्च करना पड़ता है। कैंसर फाउंडेशन में इलाज सस्ता है, लेकिन संसाधन यहां भीकम हैं।
तीन ओटी और आधुनिक उपकरण
अस्पताल में एक लाख वर्गफीट पर निर्माण के साथ तीन आधुनिक ओटी, 12 बेड का आइसीयू, 100 बेड के वार्ड, एक्स-रे, सोनोग्राफी मशीन, कोबाल्ट मशीन सहित अन्य संसाधन वर्षों से धूल खा रहे हैं। कई मशीनें व उपकरण तो रखे-रखे ही खराब हो गए। यहां मरीजों को सरकारी मदद से नि:शुल्क व सहयोगी संस्थाओं की मदद से सस्ती दर पर आधुनिक इलाज के लिए एक छत के नीचे सुविधाएं जुटाने की कोशिश की गई थी।
सरकार से सिर्फ 6 करोड़ ग्रांट की उम्मीद
रमन फाउंडेशन ने बैंक का कर्ज चुकाने के साथ अस्पताल पर करीब 22 करोड़ रुपए खर्च किए थे। समय बीतने के साथ दान देने वाले लोग भी दूर हो गए। सरकार की ओर से ६ करोड़ रुपए की ग्रांट नहीं मिली। असहयोगी रवैये से अस्पताल बंद करना पड़ा। हम अब भी कनाडा की संस्था सहित अन्य से संपर्क में हैं, जो मदद कर अस्पताल शुरू कराने को तैयार हैं।
अस्पताल स्टाफ सहित संचालन के लिए हर माह 40 से 50 लाख रुपए का खर्च है। अस्पताल शुरू करने के लिए करीब 15 करोड़ रुपए की जरूरत है। शासन वादे के मुताबिक 6 करोड़ भी दे तो एक माह में अस्पताल शुरू कर देंगे।
डॉ. सुखविंदर नैय्यर, प्रवक्ता, रमन फाउंडेशन