दवाइयों के दाम में मनमानी जारी है। सामान्य व गंभीर बीमारियों की दवाइयों के दाम कम करने सरकार ने पिछले माह 84 दवाइयों पर प्राइज कंट्रोल ऑर्डर लागू किया था। इस ऑर्डर में दाम तय करने के साथ अधिकतम मार्जिन प्राइज भी तय की गई थी। लेकिन इस पूरी कवायद का कोई असर नहीं हुआ। कुछ दवाइयां पहले के दाम में ही मिल रही हैं तो कुछ के दाम 20-40 फीसदी तक बढ़ गए।
लवीन ओव्हाल
इंदौर. दवाइयों के दाम में मनमानी जारी है। सामान्य व गंभीर बीमारियों की दवाइयों के दाम कम करने सरकार ने पिछले माह 84 दवाइयों पर प्राइज कंट्रोल ऑर्डर लागू किया था। इस ऑर्डर में दाम तय करने के साथ अधिकतम मार्जिन प्राइज भी तय की गई थी। लेकिन इस पूरी कवायद का कोई असर नहीं हुआ। कुछ दवाइयां पहले के दाम में ही मिल रही हैं तो कुछ के दाम 20-40 फीसदी तक बढ़ गए। फार्मा कंपनियां दवाइयों के ब्रांडनेम देने के साथ तय फॉर्मूले में अपनी ओर से किए गए फेरबदल के नाम पर इनकी कीमतें बढ़ा देती हैं। शहर में जेनेरिक दवाइयों की दुकानें कम हैं, इसलिए आम आदमी के पास ब्रांडनेम की महंगी दवाइयां खरीदने के अलावा विकल्प नहीं होता है।
ड्रग मैन्युफैक्चर्स के साथ रिटेल और थोक दवा व्यापारियों के इसे लेकर अलग-अलग मत है। वहीं फार्मा कंपनियां दवाओं के ब्रांडनेम देने के साथ तय फार्मूले में अपनी ओर से किए गए फेरबदल के नाम पर इनकी कीमतें बढ़ा देती है। चूंकि शहर में ऐसी दुकानें कम ही है, जहां पर जेनेरिक नाम पर दवाएं मिलती है इसलिए ब्रांडनेम की महंगी दवाएं खरीदने के अलावा आम खरीददार के पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता। इस वजह से सरकारी मंशा के विपरित आम आदमी की जेब पर दवाओं के खर्च का बोझ घटने के बजाय बढ़ गया है।
ऐसे समझें बड़ी कीमतों के पीछे का खेल
दवा क्षेत्र के सरकारी रेगुलेटर एनपीपीए ने एक बड़ा फैसला लेते हुए दवाइयों की अधिकतम कीमतें तय की थी। ऐसा माना जा रहा था कि फार्मा कंपनियां अब अपनी मर्जी से दाम नहीं बढ़ा पाएंगी, लेकिन ऐसा है नहीं। ऑर्डर के मुताबिक, तरह पैरासिटामोल और कैफीन जैसी आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवा की कीमत 2.88 रुपए प्रति टैबलेट तय की गई, लेकिन ज्यादातर ब्रांडनेम से मिले वाली दवा की कीमत 4 से 5 रुपए तक है।
कई आम व गंभीर बीमारियों की दवाएं शाामिल
नेशनल फार्माश्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी या एनपीपीए ने एनपीपीए ने ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 का सहारा लेते हुए आम बीमारियों से जुड़ी 2023 दवाओं की खुदरा कीमतें निश्चित की थी। इसमें डायबिटिज, ह्रदयरोग, कोलेस्ट्रॉल, ट्राईग्लिसराइड, सिरदर्द, हाईब्लड प्रेशर समेत अन्य बीमारियों की दवाएं शामिल हैं। उम्मीद थी कि कीमतें निश्चित हो जाने से फार्मा कंपनियां अपनी मर्जी से दाम नहीं बढ़ा पाएंगी। एक तय रेट पर ही ये दवाएं बेची जाएंगी। इससे ग्राहकों को सस्ती दर पर दवाएं मिलेंगी।
एनपीपीए के पास निगरानी का अधिकार
एनपीपीए को थोक दवाओं और फॉर्मूलेशन की कीमतों को तय या संशोधित करने और देश में दवाओं की कीमतों और उपलब्धता को लागू करने का अधिकार है। जिन दवाओं की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, एनपीपीए उनकी कीमतों की निगरानी भी करता है ताकि उन्हें सही स्तर पर रखा जा सके। एनपीपीए ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर के प्रावधानों को लागू करता है। एनपीपीए उन फार्मा कंपनियों से पैसा रिकवर कर सकता है, जो कंपनियां ग्राहकों से अधिक पैसे वसूलती हैं।
यह है एनपीपीए का काम
दरअसल, दवाओं की कीमतें तय करने का एक निर्धारित कानून है। सरकार की तरफ से एक लिस्ट बनाई गई है जिसे नेशनल लिस्ट ऑफ इसेंशियल मेडीसिन्स या एनएलईएम कहा जाता है। इस लिस्ट में वे दवाएं शामिल हैं जो जीवन बचाने के लिए बेहद जरूरी हैं। इन दवाओं के दाम फार्मा कंपनियां अपनी मर्जी से न बढ़ाएं और बेहिसाब मुनाफे का खेल न चले, इसके लिए लिस्ट में आने वाली दवाओं की कीमतें निर्धारित की जाती हैं। सरकार ने इसके लिए ड्रग रेगुलेटर एनपीपीए का गठन किया है। यही एनपीपीए, एनएलईएम लिस्ट में शामिल दवाओं की कीमतें बढ़ाने या घटाने का आदेश जारी करता है।
सरकार द्वारा तय किए गए दवाओं के दाम
फॉमूलेशन का नाम --- क्षमता --- संख्या --- अधिकतम मूल्य
कार्बमेजपाइन --- टेबलेट 200एमजी --- एक टेबलेट --- 2.34
कार्बमेजपाइन --- टेबलेट 400एमजी --- एक टेबलेट --- 4.61
कार्बमेजपाइन --- टेबलेट 100एमजी --- एक टेबलेट --- 1.02
आईब्रुप्रोफेन --- टेबलेट 200एमजी --- एक टेबलेट --- 0.59
आईब्रुप्रोफेन --- टेबलेट 400एमजी --- एक टेबलेट --- 1.04
रेनिटिडिन --- टेबलेट 150एमजी --- एक टेबलेट --- 1.10
क्लोरोक्वीन --- टेबलेट 150एमजी --- एक टेबलेट ---- 1.16
डैपसोन ---- टेबलेट 100 एमजी --- एक टेबलेट ---- 0.35
फुरोसेमिड --- टेबलेट 40 एमजी ---- एक टेबलेट === 0.74
मेड्रोनिडाजोल --- टेबलेट 400एमजी --- एक टेबलेट --- 1.25
-----
सरकार ने दवाओं की एमआरपी तय की है लेकिन कई दवा कंपनियां पहले से ही अपना चार माह तक की दवाओं स्टॉक तैयार रखती है। फिलहाल ऑर्डर आए एक माह ही हुआ है इसलिए नए रेट की दवाओं को मार्केट में आने में समय लगता है।
राजीव सिंघल, महासचिव, ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेश ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्टस
-------
दवाओं की कीमतों को लेकर सरकार द्वारा समय-समय पर डीपीसीओ यानी ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर जारी किए जाते हैं। इन निर्देशों का पालन करके ही फार्मा कंपनियों द्वारा दवाओं के दाम तय किए जाते हैं। तय दाम में 12 प्रतिशत जीएसटी अलग से जुड़ता है जिस वजह से कई बार प्राइस लिस्ट व रिटेल प्राइज में फर्क दिखता है।
हिंमाशु शाह, प्रेसीडेंट, एमपी स्मॉल स्कैल ड्रग मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन