इंदौर

दिवाली का एक चेहरा यह भी… लापरवाही के झोंके ने बुझा दी आंखों में टिमटिमाती रोशनी

इलाज और मदद का मरहम भी सिर्फ दावों में सिमटकर ही रह गई सिमटकर  

3 min read
Oct 28, 2019
indore news

इंदौर. इंदौर नेत्र चिकित्सालय की ओटी में संक्रमण के बावजूद मोतियाबिंद के ऑपरेशन कर १५ मरीजों की आंखों की रोशनी छीनने के मामले में पीडि़तों की दीवाली अंधेरे में डूबी है। जब सारा जहां रोशनी का पर्व मनाने में जुटा है, यह पीडि़त अपने जीवन में छाए अंधियारे से जुझ रहे हैं। अधिकतर लोग पहले की तरह सामान्य जिंदगी से दूर हो चुके हैं और अस्पताल की लापरवाही के कारण अंधेरी दुनिया में पहुंच गए हैं। मामला उजागर होने के बाद शासन-प्रशासन ने नि: शुल्क इलाज और आर्थिक मदद के कई दावे किए थे, लेकिन पीडि़त अब तक परेशान हो रहे हैं। अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने वाले 15 में से ६ मरीजों की आंख निकालनी पड़ी है। अब तक कृत्रिम आंखें भी नहीं लग पाई हैं। जिन लोगों का इलाज किया गया है, उनमें से भी अधिकतर पूरी तरह से देखने में सक्षम नहीं हो पाए हैं।

दूसरों का इलाज करने वाले डॉ. वैष्णव का समय बीतता है बिस्तर पर

राजगढ़ जिले के जीरापुर निवासी बालमुकुंद वैष्णव खुद आयुर्वेद डॉक्टर हैं। उन्होंने पांच अगस्त को इंदौर आई हास्पिटल में ही मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था। इसके बाद आंख में सूजन व संक्रमण होने से दिखाई देना बंद हो गया था। इलाज के लिए चेन्नई के शंकर नेत्रालय भेजा गया, लेकिन आंख नहीं बचाई जा सकी। परिवार अब दोबारा वहां जाकर कृत्रिम आंख लगाने के लिए शासन से संपर्क कर रहा है। इंदौर में रहने वाले बेटे आशुतोष ने बताया, स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट द्वारा जमीन का पट्टा, पेंशन और अन्य सुविधाओं की घोषणा की थी, लेकिन आज भी फाइल कलेक्टर कार्यालय में ही अटकी है। पिता आंख निकालने के बाद से तनाव में हैं, कई दिन तक खाना-पीना तक छोड़ दिया था। दूसरी आंख में भी मोतियाबिंद होने के कारण वह घर से नहीं निकल पाते हैं। अधिकतर वक्त पलंग पर ही बीतता है। पहले वह मरीजों का इलाज कर घर का खर्च उठाते थे। जीवन में पहली बार दीवाली के लिए मुझसे मदद मांगी। दीवाली पर गांव आने पर त्योहार की जगह मायूसी का माहौल घर में मिला।

रोशनी की बजाए इंदौर से जीवनभर का अंधेरा लेकर लौटने की तैयारी

राजस्थान के चुरू में रहने वाले हरपालसिंह जयजगत कॉलोनी इंदौर में रहने वाले बेटे नृसिंह के पास मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए आए थे। उन्हें धार के मरीजों के साथ ८ अगस्त को होने वाले कैंप में शामिल कर ऑपरेशन किया गया। चेन्नई जाने के बाद भी आंख की रोशनी नहीं लौट पाई। अब भी वह बेटे के यहां रह रहे हैं। नरसिंह ने बताया, चोइथराम नेत्रालय जाने-आने में ही काफी पैसा और समय लग रहा था। रेडक्रास से मदद के बाद कोई घोषणा पूरी नहीं हुई। अब गीता भवन में डॉ. राजेश चोधरी को ७०० रुपए फीस देकर आगे का इलाज करा रहे हैं। लंबे इलाज के बाद भी कोई फायदा नहीं होने के कारण पिता की हिम्मत टूट चुकी है। इतना सब कुछ सहन करने के बाद वह इंदौर से जल्द से जल्द लौटना चाहते हैं। १० दिन बाद डॉक्टर की सलाह पर उन्हें वापस राजस्थान भेजने की तैयारी की है।

पूरा घर संभालने वाली मुन्नीबाई रहती हैं मायूस

संगम नगर में रहने वाली मुन्नीबाई को सरकारी योजना में ऑपरेशन नहीं होने के कारण शासन से कोई मदद नहीं मिली है। चोइथराम नेत्रालय में नि: शुल्क इलाज के लिए आना-जाना संघर्ष साबित हो रहा है। वह इन दिनों सिमरोल में बेटे रणजीत के यहां रह रही हैं। रणजीत बताते हैं, ऑपरेशन से पहले मुन्नीबाई ही घर का पूरा काम-काम संभालती थी। लाख कहने के बाद भी वह दिन में कभी आराम नहीं करती थी। आंख गंवाने के बाद से वह अधिकतर समय पलंग पर ही रहती हैं। ४ अक्टूबर को अस्पताल जाने पर एक माह बाद कृत्रिम आंख लगाने की बात कही गई है। अस्पताल जाने-आने में लंबा वक्त और खर्च को लेकर मां परेशान रहती हैं। पहले की तरह घर के काम-काज नहीं कर पाने के कारण भी वह मायूस हैं। परिवार के लिए यह दीवाली रोशनी का पर्व साबित होने की बजाए परेशानियों का पहाड़ ही साबित हुई है।

Published on:
28 Oct 2019 09:00 am
Also Read
View All