इंदौर

शहर बदल रहा है, पर लोग वहीं हैं

Aug 28, 2026
datia news
datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

शहर बदल रहा है, पर लोग वहीं हैं
आधुनिकता की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए अपनी जड़ों से जुड़े रहना इंदौर शहर की खासियत है। किसी शहर की पहचान केवल बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, नाइट कल्चर, सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों, होटलों और रेस्तरां से नहीं होती, उसकी पहचान उन पुरानी गलियों से भी होती है, जिन्होंने पीढ़ियों का सफ़र देखा है।

बाहर से आने वाले व्यक्ति को यदि इंदौर को समझना हो तो उसे इसकी चेतना को जानना होगा, जो मॉल और कैफे कल्चर से इतर यहाँ की संस्कृति और परम्पराओं में बसती है। यह ऐसा शहर है जहाँ इतिहास संग्रहालय में बंद नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में चलता-फिरता दिखाई देता है। राजवाड़ा की भव्यता से निकलती गलियाँ, कृष्णपुरा की छतरियों की स्मृतियाँ, लालबाग की शाही विरासत, काँच मंदिर की अद्भुत स्थापत्य कला और पुराने बाजारों की चहल-पहल—सब मिलकर उस इंदौर की तस्वीर बनाते हैं, जिसकी जड़े गहरी हैं। 18वीं शताब्दी में होलकर काल में निर्मित राजवाड़ा आज भी पुराने शहर के बीच इतिहास का जीवंत केंद्र बना हुआ है।

इस विरासत के पीछे केवल राजसी वैभव नहीं, लोककल्याण की एक दृष्टि भी है। अहिल्याबाई होलकर की स्मृति इंदौर के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वभाव में आज भी मौजूद है। खजराना गणेश मंदिर जैसी आस्था की जगहें बताती हैं कि आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार के बीच पूजा-पाठ और मनौती की परंपरा अब भी उतनी ही सहज है। किसी नए काम से पहले गणपति को याद करने की पारिवारिक आदत हो या मंदिर में दर्शन के लिए उमड़ती भीड़—आधुनिक इंदौर अपनी आस्था से विमुख नहीं हुआ है।

त्यौहारों में तो शहर का पुराना स्वभाव जैसे पूरी तरह जाग उठता है। रंगपंचमी की गैर केवल रंगों का उत्सव नहीं, इंदौर की सामूहिकता का उत्सव है। होलकर काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी पुराने शहर की गलियों को रंग, संगीत और उल्लास से भर देती है। गणेशोत्सव की भव्य झांकियाँ, अनंत चतुर्दशी का चल समारोह और नवरात्रि की धूम—धार्मिक आस्था के साथ शहर की उत्सवधर्मिता का भी परिचय देते हैं।

और फिर इसी शहर का दूसरा चेहरा सामने आता है—आज का आधुनिक इंदौर। वह इंदौर जहाँ सुबह की शुरुआत जिम, रनिंग ट्रैक या कॉफी के साथ होती है; जहाँ युवा मेट्रोपॉलिटन जीवनशैली, स्टार्टअप और कॉर्पोरेट संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह युवा शहर को आधुनिक बनाते हुए भी उससे पूरी तरह कटता नहीं।

कॉर्पोरेट मीटिंग के बीच घर से आया पोहा-जलेबी का स्वाद उसे अपने शहर से जोड़े रखता है। कैफे कल्चर के बीच सराफा की रात अब भी आकर्षित करती है। आधुनिक परिधानों के बीच त्योहारों पर पारंपरिक रंग लौट आते हैं। भजन संध्या का नया रूप ‘भजन जैमिंग’ हो या मॉल में भक्ति के गीतों पर झूमते युवाओं के समूह—परंपरा यहाँ बदलती जरूर है, मिटती नहीं।

नई पीढ़ी की भाषा बदल गई है, जीवनशैली बदल गई है, लेकिन अपनापन, मेहमाननवाजी और मिल-बैठकर उत्सव मनाने का संस्कार आज भी इंदौर की पहचान है।

शहर बदल रहा है, उसकी रफ्तार बदल रही है,लेकिन उसकी तासीर अब भी वही है। यही इंदौर की खूबसूरती है कि वह आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी जड़ों को साथ लेकर चलता है।

आइए, इस तासीर को बरकरार रखते हुए भविष्य से कदमताल मिलाएँ—क्योंकि शहर की असली तरक्की तभी है, जब उसकी ऊँचाइयाँ बढ़े, पर उसकी जड़े और गहरी होती जाएँ।

— कल्याणी गुप्ता ‘कृति’

Updated on:
28 Aug 2026 06:01 am
Published on:
28 Aug 2026 06:01 am