बड़ी बहन होने के नाते नहीं खलने दी भाई की कमी
इंदौर. शहर में कुछ एेसे भी परिवार हैं जहां भाई नहीं है, लेकिन बड़ी बहन ने भाई का फर्ज निभाया। बहन की रक्षा करना भाई का कत्र्तव्य होता है। नंदानगर रोड 10 नंबर निवासी पुष्पा चेंडके ६ बहनों में बड़ी होने के नाते भाई का फर्ज निभा रही हैं। अविवाहित रहकर 5 सगी बहनों को प्रेम-स्नेह के साथ हर कठिन घड़ी में साथ दिया।
मां नर्मदाबाई और पिता शंकरराव की मौजूदगी में ही पूरे घर की बागडोर अपने हाथ में ले ली। पिता मिल मजदूर थे, इसलिए सभी बेटियों की शादी, पालन उनके बूते की बात नहीं थी। इस वजह से पुष्पा ने नर्सिंग की ट्रेनिंग लेकर ७० किमी दूर उज्जैन के नरवल गांव में ड्यूटी कर ली, लेकिन छोटे से गांव में विषम परिस्थितियों में ड्यूटी और ७० किमी दूरी का बहनों को अहसास नहीं होने दिया। बहनों को जब भी भाई की जरूरत महसूस हुई वे सबसे पहले आगे आईं। हर बहन कापरिवार बसाया। मराठी में बड़ी बहन को अक्का कहा जाता है। पुष्पा ने बहनों के बच्चों को भी मामा के प्रेम-स्नेह की कमी खलने नहीं दी। जब भी किसी बहन के घर पहुंचती हैं तो बच्चे ‘अक्का माउशी’ कहकर लिपट जाते हैं। अक्का सेवानिवृत्त हो चुकी हैं और माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका है। अक्का माता-पिता का भी हर कत्र्तव्य निभा रही हैं। बहनों और उनके परिवार के लिए भी उतनी ही आदरणीय हैं। रक्षाबंधन पर सभी बहनें खुद उन्हें राखी बांधने पैतृक निवास पहुंचती हैं। बदले में अक्का हर बहन को खुशहाली की दुआ देती हैं।
बहन के लिए राखी का रिश्ता बना परिवार का रक्षा कवच
भाई-भाई के साथ रहने और भाई के नहीं रहने पर परिवार संवारने के किस्से तो बहुत सुनने-देखने में आते हैं, लेकिन बहन के साथ रहकर भाई परिवार का रक्षा कवच बनना बहुत कम सुनने में आता है। सुदामानगर निवासी पुरुषोत्तम फणनवीस और तिलोत्तमा तारे का रिश्ता इसी तरह का है। करीब २६ साल पहले हृदयाघात से जीजाजी के चले जाने के बाद पुरुषोत्तम ने बहन के परिवार का रक्षा कवच बनकर कच्चे सूत की डोर के रिश्तों को शिद्दत के साथ एेसा निभाया कि भानजियों को कभी भाई और पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। चारों भानजियां हर साल मामा और मां के साथ रक्षाबंधन का त्योहार मनाकर रक्षासूत्र के रिश्ते की खुशियों को जीवंत करती हैं।
विश्वकर्मा नगर निवासी रूपाली-वैभव त्रिवेदी भावुक होकर उन दिनों को याद करने लगती हैं, जब पिता की तरह मामा छोटी सी गाड़ी पर कोचिंग और स्कूल छोडऩे और लेने जाते थे। रूपाली ने बताया, पापा विजय तारे को दो बार हार्ट अटैक आने से मामा तभी से हमारे साथ रहने लगे और पापा का पूरा ध्यान रखा। पापा ने भी उन्हें छोटे भाई की तरह स्नेह दिया। 1992 में हार्ट अटैक से पापा चल बसे। पापा वाणिज्यिक कर विभाग में थे। मम्मी की अनुकंपा पर नौकरी लग गई। इसके बाद भी मामा हमारे साथ रहे, चारों बहनों माधुरी, सोनाली और दीपाली की पढ़ाई करवाई। खुद भी पढ़ाई कर अपने पैरों पर खड़े हुए। मम्मी ने भी मामा की शादी कराई। मामा के संबल से ही हम सभी को ससुराल के लिए विदा भी किया। आज भी हमारी तकलीफ की आहट पर मां और मामा सामने मुस्कराते हुए खड़े रहते हैं।