
जबलपुर। घनघोर बारिश के लिए पहचाना जाने वाला आषाढ़ का महीना दस्तक दे चुका है। गांवों में बारिश की कहावतें भी लोगों की जुबान पर आ गई हैं। ग्रामीणों का मानना है कि आषाढ़ के महीने में जिस दिन चीटियां अंडा लेकर बिलों की तरफ जाती दिखाई दें, उस दिन बारिश अवश्य होती है। रविवार को यह संयोग कई जगह देखने को मिला। चीटिंयों ने कतारबद्ध होकर बिल की तरफ कदम बढ़ाए और इस संकेत के बाद बादल झूमकर बरसे। भले ही आज मौसम की जानकारी के लिए एक से बढ़कर एक अत्याधुनिक उपकरण मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीणजन आज भी पुरानी कहावतों पर भरोसा करते हैं। आइए, आपको भी उन ग्रामीण कहावतों से रू-ब-रू कराते हैं, जिनसे हमारी नई पीढ़ी दूर होती जा रही है। ये वही कहावतें हैं, जिनसे कभी हमारे पूर्वज बारिश का सटीक अनुमान लगा लेते थे। कहावतों के जानकारों का मानना है कि बरसात से पहले बादल या मेघ कुछ न कुछ अजब संकेत छोड़ते हैं। प्राकृतिक तरीके से व प्रकृति की मर्यादा में जीवन यापन कर रहे पशु-पक्षी और जीव-जन्तु आज भी बादलों के उन संकेतों को समझ जाते हैं। बारिश से पहले पशु-पक्षियों का सुरक्षित स्थानों पर छिप जाना। चिडिय़ों का खुशी से धूल में नहाना... और चीटिंयों का समय से पूर्व बिलों में प्रवेश कर जाना आदि इसके का जीवंत प्रमाण हैं।
प्रसिद्ध मौसम विज्ञानी थे घाघ-भड्डरी
वर्षा के बिना कृषि की कल्पना भी बेमानी है। शायद यही वजह है कि हमारे देश में बारिश हमेशा से ही लोगों के लिए उत्सुकता का विषय रही है। आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने मौसम के अनुमान के लिए अनेक उपकरण विकसित कर लिए हैं। फसलों की बोआई और संरक्षण में किसानों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब वैदिक पंचाग ही बारिश के पूर्वानुमान का एक मात्र आधार होते थे। कवि हृदय घाघ और भड्डरी ने तो पंचांग और जीव-जन्तुओं की गतिविधियों के आधार पर ही ऐसी कहावतें तक गढ़ दीं, जो युगों बाद भी प्रासंगिक मालूम पड़ती हैं। उन्हें उस युग का मौसम विज्ञानी कह दिया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। घाघ-भड्डरी आज भी कहावतों के रूप में ग्रामीणों के जेहन और जुबान पर जीवंत हैं। गांवों में अब भी लोग इन कहावतों के आधार पर ही वर्षा का अनुमान लगाते हैं और इसी के हिसाब से योजना बनाते हैं। बारिश का मौसम है... आइए आपको महान वर्षा विचारक घाघ और भड्डरी की कहावतों से परिचित कराते हैं। दोनों ही इतने विद्धवान थे कि पशु-पक्षियों, हवा और बादलों के अंदाज से वषाज़् का अनुमान लगा लेते थे, जो सटीक भी बैठता था -
बारिश के आगमन के संकेत
हवा के रुख से भी बारिश का अनुमान लगाया गया है। कहा गया है कि पुरवाई हवा यदि धरती पर लोटकर बहती है। यानी उसने चलने से धूल उड़ती है तो ग्रीष्म ऋतु की विदाई के साथ वर्षा ऋतु दस्तक देने वाली है -
जौ भुंई लोट चलै पुरवाई।
तब जानौ बरसा रितु आई।।
तिथि से गजब अनुमान
कवि हृदय जानकारों ने तिथियों से जोडकऱ भी वर्षा ऋतु के हालात का अनुमान लगाया है। किसानों को हिदायत भी दी है कि यदि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की नवमी को न बादल दिखाई नहीं दें। बिजली नहीं चमके तो किसान को अपना हल चीर-फाडकऱ चूल्हे में ईंधन के रूप में जला लेना चाहिये। खेत में जिस बीज को बोना है- उसे पका कर खा लेना चाहिए, क्योंकि अच्छी बारिश की संभावना नहीं है -
आषाढ़ सुदी हो नवमी ना बादर ना बीज।
हल फारो ईंधन करो बैठो चाबौ बीज।।
सच हुई ये कहावत
30 जून 2017 को शुक्रवार ही था और जबलपुर ही नहीं पूरे मध्य प्रदेश के आसमान को बादल ढके हुए थे। शनिवार तक छाई रही बदली ने झमाझम पानी बरसाया। लोगों ने राहत की सांस ली। कहावत में स्पष्ट है कि यदि शुक्रवार के बाद शरिवार तक आकाश में छाए रहते हैं तो भारी बारिश की संभावना बनती है -
शुक्रवार की बादली रहे शनीचर छाय ।
ऐसा बोले भड्डरी बिन बरसे न जाय ।।
चींटी से अनुमान
वर्षा के जानकार पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों की संवेदनशीलता से भी मौसम का अनुमान लगा लेते थे। कहावत में स्पष्ट है कि यदि चींटी अपने अंडों को लेकर स्थान परिवर्तन कर और चिडिय़ां चोंच या पंखों से धूल में खेलती दिखें तो यह मानना चाहिए कि भरपूर बारिश होने वाली है। रविवार को बारिश के पूर्व इसका संयोग भी देखा गया -
चींटी ले अंडा चले, चिड़ी नहावे धूर।
ऐसा बोले भड्डरी वर्षा हो भरपूर ।।
माहौल से अनुभव
घाघ और भड्डरी जैसे विद्वान माहौल में अचानक होने वाले परिवर्तनों से भी वर्षा का अनुमान लगा लेते थे। उन्होंने तिथियों को भी इसमें शामिल किया था। वे मानते थे कि यदि आषाढ़ की पूर्णिमा को खूब बादल घिरें, गरज-चमके के साथ बारिश हो तो मानना चाहिए कि चौमासे में सुखद बारिश होगी -
आषाढ़ी पूनौ दिना, गाज बीज बरसंत ।
ऐसो बोले भड्डरी, आनंद मानो संत ।।
पक्षियों से पहचान
घाघ और भड्डरी इतने महान अनुमानकताज़् और विचारक थे कि महिलाओं के हाव-भाव और पक्षियों के रंग से भी भी बारिश का सटीक अनुमान लगा लेते थे। कहावत के अनुसार यदि विधवा स्त्री आंखों में काजल लगाए दिखे तो वह घर बसाने को आतुर है इसी तरह यदि तीतर के रंग की बदली आकाश में दिखाई दे, तो वह बरसकर ही जाएगी -
तीतर बरनी बादरी विधवा काजर रेख।
वे बरसें वे घर करें, कहे भड्डरी देख।।
मेंढक से संकेत
भड्डरी ने दादुर यानी मेंढक को बोलने को भी वर्षा का संकेत माना है। उनका मानना था कि यदि ज्येष्ठ माह के अंतिम दिनों में मेंढक बोलते हैं, तो वषाज़् अवश्य होती है -
उतरे जेठ जो बोले दादूर।
कहै भड्डरी बरसे बादर।।
नक्षत्र से वर्षा विचार
जानकारों ने नक्षत्र के आधार पर भी वर्षा का विचार किया है। कहा जाता है कि मघा नक्षत्र के बरसने पर ही धरती तृप्त होती है। जिस तरह मां के परसने से भोजन में तृप्ति मिलती है। उसी तरह मघा नक्षत्र में बारश खेतों और फसलों को तृप्ति प्रदान करने वाली है। मघा की बारिश में ही खेत भरते हैं और धान की फसल अच्छी होती है -
माता न परसे भरे न पेट
मघा न बरसे भरे न खेत।
चांद से भी गणना
चंद्रमा के चारों ओर रात में कभी-कभी एक वलय सा बन जाता है। इस वलय को स्थानीय बोलियों में मंडल या मातना भी कहा जाता है। यदि यह मंडल चंद्रमा से दूर बड़े घेरे में बनता है, तो पानी दूर होता है, अथाज़्त पानी जल्दी नहीं बरसता है। यदि यह घेरा छोटा होता है... चंद्रमा के करीब रहता है, तो इसे शीघ्र ही बारिश का संकेत माना जाता है -
नियरे मातनो नियरे पानी
दूर मातनो दूर पानी।
तिथि से गजब अनुमान
कवि हृदय जानकारों ने तिथियों से जोडकऱ भी वर्षा ऋतु के हालात का अनुमान लगाया है। किसानों को हिदायत भी दी है कि यदि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की नवमी को न बादल दिखाई नहीं दें। बिजली नहीं चमके तो किसान को अपना हल चीर-फाडकऱ चूल्हे में ईंधन के रूप में जला लेना चाहिये। खेत में जिस बीज को बोना है- उसे पका कर खा लेना चाहिए, क्योंकि अच्छी बारिश की संभावना नहीं है -
आषाढ़ सुदी हो नवमी ना बादर ना बीज।
हल फारौ ईंधन करो बैठो चावो बीज।।
पुरवईया की आहट
सावन में यदि पुरवाई चलने लगे तो किसान को बैल बेच देने चाहिए। गाय खरीद लेना चाहिए। क्योंकि स्थिति अवर्षा की आने वाली है। पानी का अभाव रहेगा। इसलिए खेती हो नहीं पाएगी। बैल काम पर नहीं आएंगे। गाय ही दूध देकर तृप्त करेगी। ऐसी स्थिति में पानी का अभाव हो जाता है। खेती करना संभव नहीं रह जाता है, इसलिए गाय से काम चलाना ही उचित होता है -
सावन मास बहै पुरवाई।
बरधा बेंच लेऊ धनु गाई।।
कौओं और सियार से संकेत
यह भी कहावत है कि यदि रात में कौवा बोले और दिन में सियार फेत्कार करे तो ये दोनों इस बात का संकेत है कि या तो तबाही बरपाने वाली भारी बारिश होने वाली है या कि सूखा पडऩे वाला है। दोनों ही स्थितियों में लोगों को घर से पलायन के लिए विवश होना पड़ेगा -
रात मा बोले कागला, दिन मा बोले स्यार।
या होये झरवदरी या फिर देश उजार।।
और ये विदाई घड़ी
उक्त पंक्तियों में घाघ ने स्पष्ट भविष्यवाणी की है कि यदि दिन में गमीज़् का आभाष होने लगा है और रात में घास पर ओस दिखाई देेने लगी है तो वषाज़् के बाद विदाई ले चुके हैं। यह निश्चित जानना चाहिए। यह संकेत आश्विन या कातिज़्क मास के लिए है।
दिन में गर्मी रात में ओस।
घाघ कहै वर्षा सौ कोस..।।