जबलपुर. भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आज पूरी दुनिया में अपनी जड़ें मजबूत कर रही है। असाध्य रोगों को जड़ से खत्म करने और जीरो साइड इफेक्ट की गारंटी के कारण लोग अब एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद की ओर लौट रहे हैं। इसी दिशा में मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट […]
जबलपुर. भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आज पूरी दुनिया में अपनी जड़ें मजबूत कर रही है। असाध्य रोगों को जड़ से खत्म करने और जीरो साइड इफेक्ट की गारंटी के कारण लोग अब एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद की ओर लौट रहे हैं। इसी दिशा में मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ने एक अनूठी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने एक ऐसा 'हर्बल जीन बैंक' और ग्रीन हाउस तैयार किया है, जहां 475 से अधिक किस्म की दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संसार बसाया गया है। यहां नेपाली धनिया, राम और हनुमान फल जैसे दुर्लभ फल भी देखने को मिल रहे हैं।
एसएफआरआई के वैज्ञानिक डॉ. उदय होमकर ने बताया अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव में लोग नर्सरी या विक्रेताओं से गलत औषधीय पौधे खरीद लेते हैं। स्स्नक्रढ्ढ के वैज्ञानिकों ने इसी समस्या का समाधान खोजा है। यहां संरक्षित 475 प्रजातियों में कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं, जिनका नाम आम लोगों ने सुना तो है लेकिन उन्हें कभी देखा नहीं। संस्थान का लक्ष्य इन पौधों की संख्या को बढ़ाकर 600 तक ले जाने का है।
हमारा उद्देश्य इन्हें संरक्षित करने के साथ ही लोगों को इनके फायदे बताना है। साथ ही अनुसंधान में भी इनका उपयोग किया जा रहा है। किसान, स्टूडेंट्स और अधिकारी सभी को इनकी जानकारी प्रदान कर रहे हैं। जिन्हें रिसर्च के लिए ऑरिजनल मटेरियल चाहिए होता है तो हम उन्हें उपलब्ध कराते हैं और बताते भी हैं। आवश्कयता अनुसार पौधे तैयार भी करवाते हैं।
संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. उदय होमकर बताते हैं कि हमारे यहां प्रदेश के जंगलों से चुनी गई दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कपूर और पिपरमेंट जैसे पौधों को जीवित अवस्था में देखा जा सकता है, जिनकी पत्तियों को मसलने पर असली कपूर की खुशबू आती है।
डॉ. होमकर ने बताया यहां सीताफल के परिवार की पूरी श्रृंखला मौजूद है। लोग सीताफल के बारे में तो जानते हैं, लेकिन यहां रामफल, लक्ष्मण फल और हनुमान फल को भी संरक्षित किया गया है। साथ ही यहां नेपाली धनिया भी आकर्षण का केंद्र है, जिसकी पत्तियां पालक की तरह बड़ी होती हैं, लेकिन स्वाद और सुगंध बिल्कुल धनिया जैसी होती है।
एसएफआरआई केवल शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने का जरिया भी बन रहा है। डॉ. होमकर का कहना है कि जो किसान परंपरागत खेती छोडकऱ औषधीय खेती अपनाना चाहते हैं, उन्हें यहां से नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं। यदि कोई किसान बड़े पैमाने पर खेती करना चाहता है, तो संस्थान उसे भारी मात्रा में पौधे तैयार करके भी देता है।
आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसी औषधियों का प्रयोग यदि ताजा किया जाए, तो इनका असर कई गुना बढ़ जाता है। जबलपुर का यह गार्डन छात्रों और आयुर्वेद के शोधार्थियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। संस्थान के अनुसार आम लोग अपने घरों में पुदीना, एलोवेरा, तुलसी, अश्वगंधा, स्टीविया, रोजमेरी, करी पत्ता और तेज पत्ता जैसे पौधे आसानी से लगाकर स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं।