
GI Tag Chhattisgarh: बस्तर और समूचे छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी कला, जंगल और पारंपरिक उत्पादों से है। ढोकरा आर्ट, लौह, काष्ठ और चित्रकला को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग मिलने से बस्तर को राष्ट्रीय पहचान जरूर मिली है, लेकिन जीआई टैग की दौड़ में छत्तीसगढ़ अब भी कई राज्यों से पीछे है। प्रदेश के हिस्से में अब तक महज 8 जीआई टैग आए हैं। इनमें चार बस्तर की पारंपरिक कला से जुड़े हैं। दूसरी ओर बस्तर की हल्दी, तिखूर, इमली समेत कई ऐसे उत्पाद हैं, जिनकी पहचान सदियों पुरानी है, लेकिन उन्हें जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया अब भी अटकी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन उत्पादों की पहचान बस्तर से जुड़ी है, उनकी जीआई पहचान के लिए राज्य स्तर पर पर्याप्त प्रयास क्यों नहीं हो रहे हैं। स्थिति यह है कि बस्तर की पारंपरिक चापड़ा चटनी से जुड़ा जीआई टैग ओडिशा को मिल चुका है। इससे यह चिंता भी बढ़ रही है कि बस्तर की स्थानीय संपदा और पारंपरिक ज्ञान की पहचान दूसरे राज्यों के नाम न चली जाए।
बस्तर की हल्दी, तिखूर और अन्य उत्पादों की पहचान के लिए भी गंभीर प्रयास जरूरी हैं। इनके लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलना बड़ी चुनौती है। बस्तर में जीआई टैग की संभावनाएं बहुत हैं, लेकिन राज्य स्तर पर इसे लेकर गंभीरता और ठोस पहल की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ को अब तक सुगंधित जीराफूल चावल, नगरी दुबराज चावल, चांपा सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक सहित बस्तर की ढोकरा शिल्प, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प और चित्रकला के लिए जीआई पहचान मिली है। चांपा सिल्क के लोगो का पंजीयन भी हुआ है। राज्य के 14 अन्य उत्पादों के आवेदन पर फैसला होना बाकी है। इनमें बस्तर इमली, विष्णुभोग चावल, सीताफल, कोदो-कुटकी और पनिका साड़ी जैसे उत्पाद शामिल हैं।
उपलब्ध राज्यवार आंकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश 76 जीआई टैग के साथ सबसे आगे है। तमिलनाडु के पास 69, महाराष्ट्र 52, कर्नाटक 45, असम 40, केरल 37 और ओडिशा के पास 26 जीआई टैग हैं। छत्तीसगढ़ 7 टैग के साथ सूची में निचले हिस्से में है। अलग-अलग स्रोतों में पंजीकरण की तारीख और लोगो सहित गणना के कारण आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है, लेकिन तस्वीर साफ है कि राज्य को जीआई टैग के क्षेत्र में लंबा रास्ता तय करना है।
प्रो. मनोज कुमार श्रीवास्तव, कुलपति, शमक विवि, बस्तर के मुताबिक, विश्वविद्यालय बस्तर के बेलमेटल और बांस कला को सशक्त करने के लिए परियोजना पर काम कर रहा है। कलाकारों को डिजाइनरों और डिजिटल बाजार से जोडऩे की योजना है। जीआई टैगिंग के लिए जरूरी दस्तावेजी प्रक्रिया में भी विश्वविद्यालय सहयोग करेगा। कलाकारों की कलाकृतियों के लिए विश्वविद्यालय में एक विशेष शॉप खोलने की योजना है, ताकि बिक्री की राशि सीधे कलाकारों के खाते में पहुंचे।