जगदलपुर

अफ्रीकन प्रजाति की गिनी मुर्गी पहुंची बस्तर, खेत में असामान्य घटना होते ही देगी अलार्म

African guinea fowl: अफ्रीकन गिनी मुर्गी को लेकर उत्तरप्रदेश के प्रयागराज से कुछ लोगों का दल बस्तर पहुंचा है, जो इसका व्यवसाय करते हैं। लोग इन्हे 800 से 1000 रुपए देकर भी खरीद रहे हैं। सामान्य मुर्गी की तरह यह पालतू पक्षी है।इसका पूरा नाम हेल्मेटेड गिनी फाउल होता है।

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African guinea fowl: अफ्रीकन गिनी मुर्गी को लेकर उत्तरप्रदेश के प्रयागराज से कुछ लोगों का दल बस्तर पहुंचा है, जो इसका व्यवसाय करते हैं। लोग इन्हे 800 से 1000 रुपए देकर भी खरीद रहे हैं। सामान्य मुर्गी की तरह यह पालतू पक्षी है।

इन कई कारणों से लोग गिनी मुर्गी पसंद करते हैं
जब भी खेत में या फार्म में कुछ भी असामान्य होता है, तो गिनी मुर्गी जोरदार आवाज निकलती है। यानी एक प्रकार का अलार्म बजाती है। गिनी मुर्गी के तेज आवाज में चूहे और अन्य उपद्रवी जीव फार्म या खेत से दूर रहते हैं।

हो सकता है लाभदायी व्यवसाय
(गिनी मुर्गी) पालन एक लाभदायी व्यवसाय हो सकता है क्यों कि गिनी मुर्गी काफी सख्त जान पक्षी है, गिनी मुर्गि पर बीमारियां काफी कम आती है। साथ ही गिनी मुर्गी खेतों में से कीट का सफाया करने में काफी मदद करते है। गिनी मुर्गियी को मांस और अंडा उत्पादन दोनों के लिए भी पाला जाता है। उनके अंडे को चिकन अंडे की तरह ही खाए जा सकते हैं। युवा पक्षियों का मांस काफी स्वादिष्ठ होता है। गिनी मुर्गी के मांस पचने में आसान और आवश्यक अमीनो एसिड में समृद्ध है।

गीदम मार्ग स्थित रोड किनारे सैकड़ों की संख्या में गिनी मुर्गीयों को लेकर कुछ लोग इसे बेचने पहुंचे हैं। इसे देखने के लिए यहां लोग पहुंच रहे हैं और खरीद भी रहे हैं।

वेटनरी चिकित्सक नेहा कुर्रे ने बताया कि गिनी मुर्गी सामान्य मुर्गी प्रजाति के तरह एक पक्षी होता हैै, जो अफ्रीका से उत्पन्न हुए हैं। अफ्रीका में कई पोल्ट्री किसान खेती का व्यवसाय सफलतापूर्वक कर रहे हैं। गिनी को कभी गिनी मुर्गी, पिंटेड या ग्लानी भी कहा जाता है। वे वास्तव में जंगली पक्षी है, लेकिन अब ये घरेलू हो गए हैं। गिनी मुर्गी बहुत साहसी, जोरदार आवाज करनेवाले और रोग मुक्त पक्षी हैं। वर्तमान में वे न केवल अफ्रीका में उपलब्ध हैं, बल्कि दुनिया भर में पाए जाते हैं और लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि अब इसका पालन भारत के विभिन्न राज्यों में पोल्ट्रीफार्म में किया जा रहा है, जो अब छत्तीसगढ़ के बस्तर तक पहुंच चुका है।

कलगी से होती है नर मादा की पहचान
उन्होने बताया कि यह मूल रूप से अफ्रीका गिनिया द्वीप की रहने वाली है, उसी के नाम पर इसका नाम गिनी फाउल रखा गया है। वैसे इसका पूरा नाम हेल्मेटेड गिनी फाउल होता है, इसकी कलगी को हेल्मेट बोलते हैं, जो कि हड्डी का होता है। इसलिए इसका हेल्मेटेड गिनी फाउल नाम मिला है। इसकी कलगी से मादा और नर की पहचान की जाती है, 13 से 14 हफ्तों में मादा की कलगी नर के आपेक्षा में छोटा होता है।

Published on:
08 Dec 2022 12:34 pm
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