बहुत कुछ खोया.. बहुत कुछ पाया.. हम गुलाम थे.. आज़ाद हुए... बड़े नाज़ों के साथ खंड विखंड देश को संभाला...
-अमित शर्मा-
बहुत कुछ खोया.. बहुत कुछ पाया.. हम गुलाम थे.. आज़ाद हुए... बड़े नाज़ों के साथ खंड विखंड देश को संभाला... ताकि ये अखंड बना रह सके...
हम प्रगतिशील हुए.. हम विकासशील हुए... कुर्बानियों की धरती पर गगनचुंबी इमारतें आ गईं... गरीब की चिंता एयरकंडीशन पंचसिताराओं में होने का दौर आ गया... बॉर्डर के साथ साथ अंदर के खतरे भी बढ़ गये... पर फिर भी अलामा इकबाल की पंक्तियां मौजूं हैं-
''कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...''
आज हम जवान हैं... दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ ही सबसे बड़ी यंग पॉपुलेशन का तमगा है हमारे पास. बाजार बदल गया है. डिजिटल क्रांति हर घंटे नया तूफान ला रही है. जुकरबर्ग, लैरीपेज की निगाहें हिन्दुस्तान के युवाओं पर टिकी हैं. हमारे एक-एक क्लिक पर डॉलर की ऊंच-नीच टिकी है. दुनिया की हर बड़ी कंपनी में हिन्दुस्तानी दिमाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर से जुड़ा है...
पर इतराने की नहीं... विचार करने की बात है. क्यों ' स्मार्ट ब्रेन' पलाायन करके जा रहे हैं. डेमोक्रेसी के साइडइफेक्ट क्यूं यूथ को छिटका रहे हैं. सत्तर साल के बाद भी अगर ओडिशा के कालाहांडी में पत्नी की लाश को बारह किलोमीटर कांधे पर ढोना पड़े तो सवाल उठता है... गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन के पेमेंट न होने की कीमत तीस बच्चे जान देकर भुगते, तो सवाल उठता है.
सेना के जवानों की शहादत पर बस सरकारी निंदा का दौर चले, तो सवाल उठता है. अमरनाथ से लौट रहे यात्रियों पर आतंकी हमला हो, तो सवाल उठता है. शांति बहाली के लिए तैनात सेना पर देश के ही बाशिंदे पत्थर बरसाएं, तो सवाल उठता है. देश के सर्वोच्च पद के लिए चुनाव और जाति का राग अलापा जाये.. तो सवाल उठता है. नोटबंदी के कड़े फैसले के बाद भी अर्थव्यवस्था पटरी पर न आए.. तो सवाल उठता है.
पर जवाब कौन देगा.. सत्तासीन हुकमरानों से इसकी उम्मीद न की जाये. पार्टियां बदल जाती हैं.. चेहरे बदल जाते हैं.. पर जवाब नहीं मिलते...
आज़ादी के सत्तर बरस का जलसा जुनून से हो.. दिल से हो... पर बस एक दिन के लिए न हो.
देशभक्ति... आठों प्रहर होनी चाहिए.. 365 दिनों के लिए होनी चाहिए. ये संकल्प लेने का दिन है. कुछ अच्छा करने का दिन है... नहीं जरूरत कि कोई पहाड़ तोड़ लाओ.. पर इनसान हो.. इनसान को देख बस जरा मुस्कुराओ...
बीते साल निदा फाजली चले गए.. वो जो कह गए.. बस वही कर लें तो मान लीजिए... आप हम कुछ कर गए..
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलों यूं कर लें..
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये...
जय हिन्द.. जय भारत ... वन्दे मातरम...