
कोप्पल. मुनि अनंत कुमार ने जीरावला भवन में भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययन क्रम में प्रथम बोल संवेग पर प्रवचन देते हुए कहा कि संवेगशील आत्मा सदा सत्यप्रिय, सत्यान्वेषी और सत्याग्रही रहती है। परिस्थितियां कैसी भी हों, वह सत्य से कभी मुंह नहीं मोड़ती। उन्होंने कहा कि किसी भी लक्ष्य की ओर सही दिशा में बढऩे वाली गति को संवेग तथा विपरीत दिशा की गति को उद्वेग कहा जाता है। लक्ष्य की पहचान सम्यक ज्ञान और उस पर अटूट विश्वास सम्यक दर्शन है। जब साधक का प्रत्येक क्षण अपने लक्ष्य पर केंद्रित हो जाता है, तभी वास्तविक संवेग उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति को न भौतिक आकर्षण विचलित कर पाते हैं, न आडंबर और न ही चमत्कार। मुनि ने कहा कि परम तत्व की यात्रा के लिए घर छोडऩा आवश्यक नहीं, बल्कि आसक्ति छोडऩा आवश्यक है। उन्होंने सम्राट भरत का उदाहरण देते हुए कहा कि सांसारिक दायित्व निभाते हुए भी व्यक्ति अनासक्त रहकर आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। इस अवसर पर मुनि जैनम कुमार ने प्रेरक प्रसंग के माध्यम से सत्कर्मों के शुभ फल का महत्व समझाया।